भोपाल समाचार, 23 जनवरी 2026: साल 2024 में, पूरे देश में चिंता का विषय बन गए भोपाल के ईद का हिल्स कांड में जबलपुर स्थित हाई कोर्ट आफ मध्य प्रदेश ने अपराधी अतुल निहाले को किसी भी प्रकार की राहत देने से इनकार करते हुए, उसकी फांसी की सजा को बरकरार रखा है। हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी नृशंस दरिंदगी के मामले में, अपराधी के प्रति मानवीय दृष्टिकोण नहीं रख सकते।
बाजपेयी नगर के फ्लैट F-2 की टंकी में मासूम की डेड बॉडी मिली थी
दरिंदगी से भरा हुआ यह मामला भोपाल के शाहजहानाबाद इलाके का है। घटना 24 सितंबर 2024 को 5 साल की बच्ची अचानक लापता हो गई थी। पुलिस और परिजनों की लंबी तलाश के बाद, 26 सितंबर को ईदगाह हिल्स स्थित बाजपेयी नगर के एक फ्लैट (F-2) के बाथरूम में रखी सफेद प्लास्टिक की पानी की टंकी से मासूम का क्षत-विक्षत शव बरामद हुआ। जांच में सामने आया कि यह फ्लैट आरोपी अतुल निहाले का था, जहाँ वह अपने परिवार के साथ रहता था।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दरिंदगी की पराकाष्ठा का खुलासा हुआ
मेडिकल रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अदालती दस्तावेजों के अनुसार, आरोपी अतुल निहाले ने मासूम के साथ न केवल बलात्कार किया, बल्कि अत्यंत क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। सूत्रों के अनुसार, आरोपी ने अपनी हवस को पूरा करने के लिए रसोई में इस्तेमाल होने वाले चाकू से बच्ची के निजी अंगों को चोट पहुंचाई, जिससे उसे असहनीय पीड़ा हुई और अत्यधिक रक्तस्राव के कारण उसकी मौत हो गई। मासूम के शरीर पर चोट के 10 गहरे निशान पाए गए थे।
वैज्ञानिक साक्ष्यों ने फंसाया शिकंजा इस मामले में पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) और फोरेंसिक विशेषज्ञों ने पुख्ता सबूत जुटाए। डीएनए (DNA) रिपोर्ट ने इस मामले में निर्णायक भूमिका निभाई। फोरेंसिक जांच में आरोपी अतुल निहाले के कपड़ों और घटनास्थल से मिले खून के धब्बों का मिलान आरोपी के प्रोफाइल से हुआ। साथ ही, आरोपी की निशानदेही पर वह चाकू और खून से सने कपड़े भी बरामद किए गए, जिनका उपयोग अपराध में हुआ था।
हाई कोर्ट ने Rarest of Rare मामला बताया
जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस रामकुमार चौबे की खंडपीठ ने निचली अदालत द्वारा दी गई मौत की सजा की पुष्टि करते हुए इसे 'विरलतम से विरल' (Rarest of Rare) मामला माना। अदालत ने कहा कि आरोपी का कृत्य न केवल अमानवीय था, बल्कि समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला था। कोर्ट ने आरोपी के आपराधिक इतिहास को देखते हुए किसी भी प्रकार की सहानुभूति दिखाने से इनकार कर दिया और उसकी अपील को खारिज कर दिया।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसे जघन्य अपराधियों को समाज में रहने का कोई अधिकार नहीं है जो मासूमों को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। इस फैसले के बाद पीड़ित परिवार ने न्याय प्रणाली पर अपना विश्वास दोहराया है।

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