BHARAT में प्राकृतिक आपदाएं और अधिक बढ़ने वाली है और सरकार क्या कर रही है, पढ़िए

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नई दिल्ली, 4 दिसंबर 2025
: हिमालय बहुत खतरे में है। अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्टें चेतावनी देती हैं कि अगर ग्लोबल वार्मिंग न रुकी, तो 1/3 ग्लेशियर गायब हो सकते हैं। इससे पानी की भारी कमी, ज्यादा प्राकृतिक आपदाएं (बाढ़, भूस्खलन), खाद्य संकट और लाखों लोगों का विस्थापन होगा। इस मामले में सरकार क्या कर रही है, आज संसद में बताया गया। 

मौसम इतनी तेजी से क्यों बदल रहा है? सबसे पहले पढ़िए, प्रॉब्लम क्या है:-

हिमालय पर जलवायु परिवर्तन का बहुत बुरा असर पड़ रहा है। तापमान तेजी से बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियर पिघल रहे हैं, बर्फ कम हो रही है। इसके कारण पूरे भारत देश में बारिश अनियमित हो गई है, बाढ़ और सूखे बढ़ गए हैं। इससे नदियों का पानी कम हो रहा है, जो 24 करोड़ लोगों की जिंदगी और खेती को प्रभावित कर रहा है। हिमालय की जैव विविधता (वन्यजीव, पेड़-पौधे) भी खतरे में है, और हिमनद झीलें फटने से बड़ी तबाही का खतरा बढ़ गया है। सरल हिंदी में सरकार का पक्ष और अपना निष्कर्ष बाद में पढ़ेंगे पहले पढ़िए - अंतर्राष्ट्रीय रिपोर्ट क्या कहती है?: 

ICIMOD (अंतर्राष्ट्रीय पर्वतीय विकास केंद्र) की 2019 रिपोर्ट: हिंदू कुश हिमालय (एचकेएच) क्षेत्र में तापमान वैश्विक औसत से ज्यादा तेजी से बढ़ रहा है। 2000 से ग्लेशियर 20-47% सिकुड़ चुके हैं, खासकर पूर्वी हिमालय में। 1970 से 8,000 वर्ग किमी बर्फ पिघली है। इससे नदियों (इंडस, गंगा, ब्रह्मपुत्र) का पानी प्रभावित हो रहा है, जो अरबों लोगों को पानी देती हैं। रिपोर्ट कहती है कि जलवायु परिवर्तन से मौसम अनिश्चित हो गया है, बाढ़-सूखा बढ़ा है।

IPCC (संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन पैनल) की रिपोर्टें: 2007 और बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि हिमालय ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो पानी की कमी और बाढ़ का कारण बनेगा। 2019-2022 की रिपोर्टों में चेतावनी दी गई कि क्षेत्र की पारिस्थितिकी संकट में है, और अनुकूलन के लिए तत्काल कदम जरूरी हैं।

WWF (विश्व वन्यजीव कोष) रिपोर्ट: हिमालय जलवायु परिवर्तन का सबसे संवेदनशील क्षेत्र है। ग्लेशियर पिघलने, तापमान बढ़ने और बारिश बदलने से लोग और जानवर प्रभावित हो रहे हैं। इससे जैव विविधता नष्ट हो रही है और भोजन-पानी की सुरक्षा खतरे में है।

अन्य रिपोर्टें (जैसे नेशनल ज्योग्राफिक, 2022): 200 वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में कहा गया कि हिमालय में गर्मी बढ़ने से ग्लेशियर तेजी से पीछे हट रहे हैं, जो निचले इलाकों में बाढ़ और सूखे ला रहा है।

भारत सरकार के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने संसद में क्या बताया 

भारत सरकार ने संसद में बताया कि हिमालय पर जलवायु परिवर्तन के बुरे प्रभावों को रोकने और समझने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। जो संक्षिप्त में इस प्रकार हैं:-
  • हिमालय के ग्लेशियरों निगरानी और अध्ययन कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियर कैसे सिकुड़ रहे हैं और नदियों के पानी पर क्या असर पड़ रहा है। पिछले 20 सालों में इस इलाके ने अपनी बर्फ का 6% खो दिया है, और हर साल ग्लेशियर 13 से 33 मीटर पीछे हट रहे हैं।
  • अनुसंधान परियोजनाएं: कई प्रोजेक्ट चल रहे हैं और सब में निगरानी हो रही है।
  • बाढ़ से बचाव: सरकार ने ऐसा चेतावनी सिस्टम डेवलप कर लिया है कि जब भी बाढ़ आती है, लोगों को पहले बता दिया जाता है ताकि वह अपनी जान बचा सकें।
  • संस्थाओं की भूमिका: 20 से ज्यादा संस्थान और विश्वविद्यालय ग्लेशियरों की निगरानी कर रहे हैं। इन्होंने पाया है कि हिंदू कुश हिमालयी ग्लेशियर हर साल औसतन 14.9 मीटर पीछे हट रहे हैं। यह सिंधु बेसिन में 12.7 मीटर, गंगा में 15.5 मीटर और ब्रह्मपुत्र में 20.2 मीटर प्रति वर्ष है। लेकिन काराकोरम इलाके में यह कम (-1.37 मीटर) है। कुल मिलाकर, तेज और असमान बर्फ हानि हो रही है।

निष्कर्ष: सरकार के पास सिर्फ सायरन है, पब्लिक को पलायन करना होगा

संसद में पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के जवाब से स्पष्ट हो गया है कि सरकार सिर्फ निगरानी कर रही है। अनुसंधान परियोजनाओं के नाम पर भी निगरानी की जा रही है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने एक ऐसा सायरन बना लिया है जो बाढ़ आने की स्थिति में लोगों को पहले से बता देगा ताकि वह अपनी जान बचाकर भाग सकें। इसका मतलब हुआ कि सरकार के पास बाढ़ को रोकने का ना तो कोई तरीका है और ना ही इस दिशा में कोई काम किया जा रहा है। यदि प्राकृतिक आपदाओं की संख्या बढ़ती है तो सामान्य जीवन के लिए पब्लिक को पलायन करना ही होगा।
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