आजकल पूरी दुनिया में भारत और अमेरिका का तुलनात्मक अध्ययन चल रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था। यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका, कितने मामलों में विश्व के लिए महत्वपूर्ण है और पृथ्वी पर मानवता की रक्षा के लिए अमेरिका कितना जरूरी है। इसी श्रृंखला में आज हम आपको बताते हैं कि, एक क्षेत्र ऐसा है जहां भारत दुनिया का हीरो है जबकि अमेरिका जीरो है।
यूरोप और अमेरिका के पास जमीन तो ज़्यादा, पर कमिटमेंट बहुत कम
Science Journal में छपी एक नई स्टडी बताती है कि दुनिया के 90% पेड़ लगाने के वादे गरीब और मध्यम आय वाले देशों ने किए हैं, जबकि यूरोप और अमेरिका जैसे अमीर देशों के पास जमीन तो ज़्यादा है, पर कमिटमेंट बहुत कम। अफ्रीका के पास केवल 4% उपयुक्त जमीन है, लेकिन उसने आधे से ज़्यादा वादे कर डाले हैं। वहीं, भारत और चीन जैसे एशियाई देशों के पास बड़ी संभावनाएँ हैं और इन्होंने ठोस कदम भी उठाए हैं।
भारत ने 21 मिलियन हेक्टेयर जमीन डोनेट कर दी, अमेरिका ने 1 इंच भी नहीं दी
भारत इस दौड़ में सबसे आगे है। रिसर्च के मुताबिक भारत के पास लगभग 21 मिलियन हेक्टेयर (Mha) जमीन है जो टिकाऊ तरीके से वृक्षारोपण के लिए इस्तेमाल की जा सकती है। भारत ने पहले ही करीब 16 Mha के लिए कमिटमेंट कर दिया है, जो लगभग ब्रिटेन के आकार की जमीन के बराबर है। तुलना करो तो अमेरिका के पास लगभग उतनी ही जमीन है (25 Mha), लेकिन उसने एक इंच भी कमिटमेंट नहीं किया है।
इसका सीधा अर्थ हुआ कि पृथ्वी पर मनुष्य प्रजाति को जीवित रखने के लिए, कार्बन से लड़ने और ऑक्सीजन को पैदा करने के लिए भारत दुनिया में सबसे ज्यादा योगदान दे रहा है जबकि अमेरिका इस लड़ाई में दुनिया के साथ भी नहीं है। वह सिर्फ ट्रेड कर रहा है।
Green protector of the earth
क्या अमेरिका के पास इस बात का जवाब है कि 2050 में जब पृथ्वी पर ऑक्सीजन लेवल कम हो जाएगा, कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ जाएगी, तब वह कौन से ग्रह पर हमला करने की धमकी देकर ऑक्सीजन के लिए ट्रेड डील करेगा? आज जबकि भारत जैसा देश, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम चुनौतियों का सामना कर रहा है, फिर भी वह पृथ्वी पर मानव प्रजाति की रक्षा के लिए सबसे बड़ा योगदान दे रहा है। आज की तारीख में भारत, पृथ्वी का हरित रक्षक बन गया है।
दुनिया के लिए कितना महत्वपूर्ण है भारत
आज भारत की ग्रीन कवर (जंगल और पेड़ दोनों मिलाकर) कुल भौगोलिक क्षेत्र का 25.17% हो चुका है। 2021 से 2023 के बीच इसमें 1,445 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी हुई है। भारत में पेड़ लगाना कोई नया फैशन नहीं है। यहाँ तो बरगद, पीपल, तुलसी जैसे पौधे पूजा और आस्था का हिस्सा रहे हैं। गाँव-गाँव में “वृक्ष देवता” और “वनदेवी” की कहानियाँ सुनी जाती रही हैं। यानी प्रकृति पूजन हमारी संस्कृति की जड़ में है। यही सोच आज फिर अभियानों में ज़िंदा हो रही है।
एक पेड़ माँ के नाम
‘एक पेड़ माँ के नाम’ जैसे कैंपेन इस विचार को जनांदोलन बना रहे हैं। अकेले इस पहल के तहत करोड़ों पौधे लगाए गए हैं और लाखों हेक्टेयर जमीन पर हरियाली फैलाई गई है। सरकार की ग्रीन इंडिया मिशन और अरावली ग्रीन वॉल जैसी योजनाओं ने भी नए जंगल खड़े किए हैं।
सिर्फ पेड़ लगाना नहीं, समझदारी से लगाना ज़रूरी है
पेड़ लगाना जलवायु परिवर्तन से लड़ाई का आसान हल माना जाता है। लेकिन Science जर्नल में छपी एक नई स्टडी कहती है कि हकीकत उतनी सीधी नहीं है। रिसर्च के मुताबिक दुनिया भर में अगर पेड़ लगाने और जंगल बहाल करने के काम सही जगह पर और टिकाऊ तरीके से किए जाएँ, तो 2050 तक करीब 40 गीगाटन कार्बन को सोख सकते हैं-यानी पिछले दस सालों में धरती के कार्बन सिंक का लगभग 63 प्रतिशत। लेकिन, ये अनुमान पहले की तुलना में आधा है क्योंकि इसमें जैव विविधता, खाद्य सुरक्षा और पानी जैसे जोखिमों को ध्यान में रखा गया है।
सिर्फ पेड़ नहीं उसकी प्रजाति भी महत्वपूर्ण होती है
विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ़ पेड़ लगाने से काम पूरा नहीं होगा। यह देखना होगा कि कौन-सी प्रजातियाँ लगाई जा रही हैं, उनकी देखभाल कैसे हो रही है, और क्या वे जैव विविधता को सहारा दे रही हैं या नहीं। क्योंकि अगर एकसाथ केवल एक ही प्रजाति (monoculture) लगा दी गई, तो उससे न तो कार्बन शोषण होगा और न ही पर्यावरण को असली फायदा।
संदेश साफ है: पेड़ लगाना ज़रूरी है, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है पुराने जंगलों को बचाना और जो लगाएँ उनकी देखभाल करना। भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका दिखाई है, पर असली जीत तभी होगी जब हर पेड़ जड़ पकड़कर आने वाली पीढ़ियों के लिए साया बने।