चश्मदीद गवाह के बयान का कोर्ट में कितना महत्व होता है जानिए चौंकाने वाला सच- Indian Evidence Act, 1872

Bhopal Samachar
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अक्सर हम मूवी में देखते हैं की जब किसी आरोपी को कोर्ट में लाया जाता है और कोई मौका-ए-वारदात पर मौजूद व्यक्ति गवाही देता है कि मैंने इस आरोपी व्यक्ति को अपराध करते देखा हैं तब कोर्ट उसके बयान को सही मानते हुए आरोपी को अपराधी घोषित करके सजा सुना देता है। आइए जानते हैं कि क्या सचमुच प्रत्यक्षदर्शी व्यक्ति की गवाही इतनी महत्वपूर्ण होती है कि केवल चश्मदीद गवाह के बयान के आधार पर किसी व्यक्ति को दंडित किया जा सके।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम ,1872 दो प्रकार के साक्ष्यों को महत्व देता है प्राथमिक साक्ष्य एवं द्वितीयक साक्ष्य। सभी दस्तावेजी साक्ष्य प्राथमिक साक्ष्य होते हैं एवं मौखिक या ओरिजिनल दस्तावेज की कॉपी द्वितीयक साक्ष्य होती है। अर्थात व्यक्ति द्वारा दिया गया मौखिक बयान या कथन प्राथिमक साक्ष्य नहीं होगा। अगर किसी आरोपी पर व्यक्ति मौखिक रूप से अपराध का इल्जाम लगाता है तब यह अरोपी द्वितीयक साक्ष्य होगा आरोपी आपने बचाब के लिए दस्तावेजी (प्राथिमक) साक्ष्य का प्रयोग कर सकता है।

कुल मिलाकर साधारण शब्दों में कहे तो न्यायालय चश्मदीद गवाह के बयान मात्र पर आरोपी को दोषी नहीं मान सकता है। इसके लिए न्यायालय के समक्ष दस्तावेजी साक्ष्य पेश करना जरूरी होता है क्योंकि गवाह या साक्षियों को खरीद कर बयान दिलवाया जा सकता है लेकिन ओरिजनल दस्तावेज नहीं बनाए जा सकते हैं। Notice: this is the copyright protected post. do not try to copy of this article) :- लेखक बी.आर. अहिरवार (पत्रकार एवं लॉ छात्र होशंगाबाद) 9827737665

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