सैकड़ों त्रिकोण, कुंड चौकोर तो फिर नाम चाँद बावड़ी कैसे पड़ गया- History and Story of Chand Baori

राजस्थान की राजधानी जयपुर से 95 किलोमीटर दूर दौसा जिले में अत्यंत लोकप्रिय पर्यटक स्थल चाँद बावड़ी स्थित है। यह एक ऐसी जल संरचना है जिसे देखने के लिए दुनिया भर के लोग आते हैं। यहां 3500 सीढ़ियां सैकड़ों त्रिकोण के आकार में बनी हुई है और इसका मुख्य कुंड चौकोर है। फिर भी इसे चांद बावड़ी का है जाता है। आइए जानते हैं कि पूरे निर्माण में एक भी चंद्राकार नहीं होने के बावजूद इसे चांद बावड़ी क्यों कहा जाता है। 

चाँद बावड़ी की खास बातें

इसका निर्माण 9वीं शताब्दी में राजा मिहिर भोज द्वारा करवाया गया था। 
यह चारों तरफ से 35 मीटर चौड़ी है। 
इसके अंदर कुल 3500 सीढ़ियां है। 
बावड़ी की गहराई 100 फीट है। 
बावड़ी में कुल 13 मंजिल है। 
इसे विश्व की सबसे गहरी और बड़ी बावड़ी कहा जाता है। 
रेन वाटर हार्वेस्टिंग की सबसे पुरानी जल संरचना है। 
सभी सीढ़ियां समान आकार में बनाई गई हैं। आश्चर्यजनक है कि उस जमाने में सीढ़ियों का आकार सामान कैसे रखा गया।
बावड़ी के भीतर सभी चारों दीवारों पर सीढ़ियों के सैकड़ों त्रिकोण बने हुए हैं। जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र होते हैं।

चाँद बावड़ी का नाम चाँद बावड़ी कैसे पड़ा 

यह बावड़ी हर्षद माता मंदिर के सामने है। राजा मिहिर भोज ने बनवाई थी। सीढ़ियों के सैकड़ों त्रिकोण आकर्षण का केंद्र है इसके बावजूद इस जल संरचना का नाम चाँद बावड़ी रखा गया। इसके पीछे एक नहीं तीन कारण है। 
राजा मिहिर भोज को चांद राजा के नाम से भी जाना जाता था। इसलिए राजा के नाम पर इस बावड़ी का नाम चांद बावड़ी पुकारा गया।
पूर्णिमा की रात यानी चांदनी रात में इस बावड़ी के अंदर अद्भुत चांदी जैसी चमकदार सफेद रोशनी दिखाई देती है। इसलिए इसे चांद की बावड़ी कहा गया।
यह बावड़ी आभानेरी गांव में स्थित है। इसका मूल नाम आभा नगरी है। जिसका तात्पर्य होता है चमकदार नगर यानी चंद्रमा का नगर।

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