IAS तपस्या परिहार की शादी पर उठे सवाल और जवाब एक साथ पढ़िए- MP NEWS

Bhopal Samachar
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जबलपुर
। कन्यादान की रस्म को ठुकराकर शास्त्रानुसार विवाह संस्कार को खंडित करने का आरोप झेल रही भारतीय प्रशासनिक सेवा के महिला अधिकारी तपस्या परिहार ने एक इंटरव्यू के दौरान कहा कि 'ये मेरी शादी थी। मैं कहीं जाकर किसी को भाषण नहीं दे रही कि ऐसा करो।' तपस्या सेंधवा में SDM हैं। 

IAS तपस्या परिहार ने क्या किया जो चर्चा का विषय बन गया 

मध्यप्रदेश के नरसिंहपुर जिले की रहने वाली तपस्या परिहार आईएएस ने IFS ऑफिसर गर्वित गंगवार के साथ दिनांक 12 दिसंबर 2021 को आयोजित विवाह संस्कार के दौरान कन्यादान की रस्म निभाने से इंकार कर दिया था। उनके मित्र एवं परिचितों ने इस बात को पब्लिक कर दिया और यह घटनाक्रम सार्वजनिक समाचार की विषय वस्तु बन गया। शुरुआत में तपस्या परिहार आईएएस के इस निर्णय की सराहना की गई लेकिन फिर बाद में समाज के एक वर्ग ने आरोप लगाया कि तपस्या परिहार ने विवाह संस्कार की परंपरा को खंडित किया है।

तपस्या परिहर आईएएस के तर्क- कन्यादान से इंकार क्यों किया

सराहना के साथ जब निंदा हुई तो तपस्या परिहार ने एक बार फिर इस विषय पर अपना पक्ष रखा। दिनांक 20 दिसंबर 2021 को दैनिक भास्कर के पत्रकार को दिए अपने इंटरव्यू में तपस्या परिहार ने कहा कि:- 
कन्यादान शब्द ही बुरा लगता है। बेटियां दान करने की चीज नहीं होतीं। 
मेरा दान कैसे कोई कर सकता है। भले ही वह मेरा परिवार है, पर उन्हें भी ये अधिकार नहीं कि मुझे किसी को दान कर दें। 
कन्यादान के पीछे की सोच से ही परेशानी है। जहां तक मैं इसके बारे में सोच और समझ पाई हूं कि इसके पीछे का ख्याल रहता है कि कन्या को एक परिवार से दूसरे परिवार को सौंपा जा रहा है। 
शादी में इस तरह क्यों होता है कि बेटियां बड़ी हुईं तो उन्हें अपने ही परिवार से रिश्ता तोड़ना पड़ता है। 
यह बहुत ही पर्सनल डिसिजन था। हमें लगा नहीं कि कोई परंपरा तोड़ रहे हैं। 
हमारी शादी है, हमारे परिवारवाले राजी हैं। हमें जिस तरीके से जो रस्में करनी है, वैसा किया। 
पॉइंट ये है कि ये मेरी शादी थी। मैं कहीं जाकर किसी को भाषण नहीं दे रही कि ऐसा करो। 

तपस्या परिहार के निर्णय को गलत बताने वालों के तर्क 

यदि कन्यादान की रस्म से परहेज़ ना तो फिर अग्निकुंड और सात फेरों की भी जरूरत नहीं थी। कोर्ट मैरिज कर लेना चाहिए था। 
विवाह एक सामाजिक संस्कार है जिसके रीति नीति और नियम निर्धारित हैं। उन्हें कोई व्यक्तिगत स्तर पर अपनी मर्जी से बदल नहीं सकता। 
यदि व्यक्तिगत निर्णय था तो उसे सार्वजनिक क्यों किया गया। 
विशिष्ट नागरिकों का व्यक्तिगत जीवन दूसरों के लिए आदर्श होता है और लोग उसका अनुसरण करते हैं। तपस्या परिहार यदि सामान्य घरेलू महिला होती तो तो शायद इतनी आपत्ति नहीं होती। 
कन्यादान सिर्फ एक संक्षिप्त शब्द है, जिसका व्यापक अर्थ है। इनकार करने से पहले तपस्या परिहार को शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए था। 
सनातन धर्म में शास्त्रार्थ करने का अधिकार सभी को है। शास्त्रार्थ के माध्यम से कई परंपराओं को बदला गया है लेकिन नियमों को तोड़ना उचित नहीं है। 
शास्त्रों के अनुसार तपस्या परिहार का विवाह संस्कार पूर्ण नहीं हुआ है।
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