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सबको वैक्सीन मिलने में अमेरिकी बाजारवाद रोड़ा - Pratidin

भोपाल में मेरे दोस्त कल रात से अपने दोस्तों को चेताने लगे हैं, रात को लागू नाईट कर्फ्यू के पहले घर पहुँचने की सरकारी अपील असर दिखा रही है | दुष्काल की आहटें दुबारा क्यूँ सुनाई दे रही है, विचार का विषय है | अब कितना भी विचार करो, पहले जैसा- बल्कि उससे कहीं अधिक कड़ा परहेज बरतने और वैक्सीन की जरूरत सब बता रहे हैं| वैक्सीनेशन के लिए नगर निगम की ओंर से अपील की जा रही है | होली का हुडदंग सिमटता सा लग रहा है | यह तर्क सत्य के करोब है कि वैक्सीनेशन यानी टीकाकरण जितनी जल्दी हो सके, ज्यादातर लोगों को वैक्सीन की सुरक्षा दे दी जाए, तभी महामारी की आफत से निजात पाई जा सकती है। कोविड-१९ फैलाने वाले कोरोना वायरस के मामले में तो यह और भी जरूरी है। वैक्सीन सबको उपलब्ध हो, उसमे “बाजारवाद” एक बड़ा रोड़ा है, इसका तोड़ जो बाईडेन के पास है, मगर वो चुप है |

विज्ञानी कहते हैं ऐसे वायरस मौजूद रहेंगे, तो नए रूप धरते रहेंगे और हमारी चुनौतियां बदलते, बढ़ाते रहेंगे। अभी तो हालात यह है आप सोचते हैं , मैंने तो वैक्सीन ले ली है, तभी हो सकता है कि वायरस ऐसा वेष धरकर आपका दरवाजा खटखटाए, जिसके लिए आपकी वैक्सीन भी तैयार न हो। इसलिए जरूरी है कि ज्यादातर लोगों को वैक्सीन लगाई जाए और पूरी दुनिया में लगाई जाए। अभी सुरक्षा का हमारे पास इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं है। दुनिया के देशों में सिर्फ इजरायल ही ऐसा है, जिसने अपने सभी नागरिकों को वैक्सीन की दोनों खुराक दे दी है। अमेरिका ने कहा है कि वह एक मई तक इस काम को अंजाम दे देगा। ब्रिटेन ने अगस्त को लक्ष्य बनाया है। पर हम भारतीयों की किस्मत इतनी अच्छी नहीं है। संतोष की बात सिर्फ इतनी है कि यहां बहुत तेजी से टीकाकरण चल रहा है। समस्या यह जरूर है कि हमारे यहां जिस बड़ी तादाद में टीकाकरण की जरूरत है, उसके मुकाबले हमारा स्वास्थ्य-इंफ्रास्ट्रक्चर काफी कम है, इसलिए समय तो लगेगा ही।

हमारे मुकाबले दुनिया के बहुत से देशों की स्थिति तो शायद इतनी अच्छी भी नहीं है। संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख एंटोनियो गुटेरस के अनुसार दुनिया के १३० देश ऐसे हैं, जहां अभी तक वैक्सीन की एक भी खुराक नहीं पहुंची है। विश्व स्वास्थ्य संगठन बार-बार कह रहा है कि अगर यही स्थिति रही, तो यह महामारी हाल-फिलहाल में नहीं जाने वाली। यानी जो देश पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य हासिल करके फिर से पुराने दिनों की रौनक में लौटने का रोडमैप बना रहे हैं, उनके सुरक्षित भविष्य की भी कोई गारंटी नहीं होगी। जिस वैक्सीन को रामबाण मानकर हमने पिछले १२ महीने जैसे-तैसे गुजारे , वह हासिल भले ही हो गई, पर अपने लक्ष्य से बहुत दूर है।

इस लक्ष्य को हासिल करने का रास्ता क्या है? सिर्फ एक वही रास्ता है, जो पिछले साल अक्तूबर में भारत और दक्षिण अफ्रीका ने सुझाया था। इन दोनों देशों ने विश्व व्यापार संगठन को एक पत्र लिखकर यह आग्रह किया था कि कोविड-१९ की बनने वाली वैक्सीन से बौद्धिक संपदा अधिकार यानी पेटेंट वगैरह को हटा लिया जाए। इससे इस वैक्सीन को कोई भी कहीं भी बना सकेगा और कहीं भी भेज सकेगा। फिलहाल सबसे बड़ी जरूरत यही है कि बड़े पैमाने पर वैक्सीन बने, सस्ती बने और सबको उपलब्ध हो । उसके बाद से अब तक दुनिया के ८० देश ऐसे पत्र लिख चुके हैं। अभी कोई इस पर ध्यान भले न दे रहा हो, लेकिन इसने अमेरिका की दवा कंपनियों को जरूर चिंतित कर दिया है। इन कंपनियों ने अमेरिका के नव-निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन को एक संयुक्त ज्ञापन भेजकर कहा कि भारत और दक्षिण अफ्रीका ऐसी मांग कर रहे हैं और किसी भी तरह से ऐसा होने से रोका जाए। बाइडन ने इस पर चुप्पी साध ली है, वह न तो इन कंपनियों को नाराज करना चाहते हैं और न ही दुनिया के गुस्से का शिकार बनना चाहते हैं। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि इन कंपनियों ने वैक्सीन का विकास और निर्माण अपने निवेश से नहीं किया है, इनमें से लगभग सभी की अमेरिकी सरकार ने बड़ी आर्थिक मदद की है। सबसे पहले वैक्सीन को बाजार में लाने वाली मॉडेरना को तो डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इसके लिए ५० करोड़ डॉलर की मदद की थी। अमेरिकी कंपनियों की जितनी भी वैक्सीन बाजार में उतर चुकी हैं, उनमें उनका खुद का नहीं, बल्कि वहां के लोगों और कंपनियों द्वारा दिए गए कर का पैसा है। ये कर भी उन्होंने अपनी उस कमाई में से चुकाए हैं, जो पूरी दुनिया के लोगों के माइक्रोसॉफ्ट और एडोब के सॉफ्टवेयर खरीदने, गूगल और एंड्राएड के इस्तेमाल करने या अमेजन जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर खरीदारी से उन्हें हुई है। इस गणित से इन टीकों पर पूरी दुनिया का अधिकार बनता है। अब अमेरिकी सरकार के निवेश से इन दवा कंपनियों के शेयरों के भाव लगातार बुलंदी पर जा रहे हैं और उनका बाजार पूंजीकरण भी तेजी से बढ़ रहा है।

अमेरिकी कंपनियां खासतौर पर किसी अन्य देश की कंपनी के साथ समझौता करने से बच रही हैं। एकमात्र अपवाद जॉनसन ऐंड जॉनसन है, जिसने एक भारतीय कंपनी से वैक्सीन की एक करोड़ खुराक बनाने का समझौता किया है। जबकि ब्रिटिश कंपनी एस्ट्राजेनेका की कोवीशील्ड भारत की सीरम इंडिया में बन रही है और यहां इस्तेमाल भी हो रही है। इसी तरह, रूस ने भी अपनी स्पूतनिक वैक्सीन बनाने के लिए डॉ. रेड्डी लेबोरेटरीज से समझौता किया है। अगर बौद्धिक संपदा अधिकार पर भारत और दक्षिण अफ्रीका की मांग स्वीकार कर ली जाती है, तो भारतीय व तमाम दूसरे देशों की और कंपनियां आगे आ सकती हैं और पूरी दुनिया में वैक्सीन की किल्लत खत्म हो सकती है। अगर नहीं मानी जाती है, तो आगे जाकर यह भारत को परेशान भी कर सकती है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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