ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक मंत्रियों के खिलाफ याचिका हाई कोर्ट में खारिज - MP NEWS

Updesh Awasthee
जबलपुर
। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष एवं विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष कमलनाथ कैंप को झटका देने वाली खबर है। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में उस याचिका को खारिज कर दिया है जिसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक मंत्रियों को दल बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित करने की मांग की गई थी। 

मुख्य न्यायाधीश मोहम्मद रफीक व विजय कुमार शुक्ला की युगलपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। इस दौरान जनहित याचिकाकर्ता छिंदवाड़ा निवासी अधिवक्ता आराधना भार्गव की ओर से अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि मार्च, 2020 में कांग्रेस के 22 विधायकों ने अपने पद से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण कर ली। विधायक पद से इस्तीफा देने वाले तुलसीराम सिलावट, बिसाहूलाल सिंह, ऐदल सिंह कंसाना, गोविंद सिंह राजपूत, इमरती देवी, डॉ. प्रभुराम चौधरी, डॉ. महेंद्र सिंह सिसोदिया, प्रद्युम्न सिंह तोमर, हरदीप सिंह डंग, राज्यवर्धन सिंह, विजेंद्र सिंह यादव, गिरिराज दंडोतिया, सुरेश धाकड़ व ओपीएस भदौरिया को मंत्री बना दिया गया।

संविधान के अनुच्छेद 164 का उल्लंघन 

अधिवक्ता उपाध्याय ने तर्क रखा कि संविधान के अनुच्छेद 164 के तहत मंत्री बनाए जाने के लिए विधायक होना जरूरी है लेकिन उक्त 14 मंत्रियों में से कोई भी विधायक नहीं रहा। विशेष परिस्थितियों में मुख्यमंत्री किसी विद्वान, किसी विषय विशेष के विशेषज्ञ या ऐसे किसी व्यक्ति को जिसे मंत्री बनाया जाना आवश्यक हो, मंत्री नियुक्त कर सकता है। लेकिन प्रदेश में ऐसी परिस्थितियां न होने के बावजूद मनमानी तरीके से उक्त 14 लोगों को विधायक न होते हुए भी मंत्री बना दिया गया। जिन लोगों ने खुद विधायक रहना नहीं चाहा और जनता के चुने हुए पद से इस्तीफा दे दिया, उन्हें मंत्री बनाया जाना संविधान के अनुच्छेद 164 का सीधा उल्लंघन है। विशेष परिस्थितियां भी एक या दो लोगों के लिए हो सकती हैं, 14 लोगों के लिए एक साथ नहीं। 

जनहित याचिका औचित्यहीन हो चुकी है इसलिए खारिज

राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता स्वप्निल गांगुली ने तर्क दिया कि प्रदेश में नए चुनाव हो चुके हैं। इसलिए अब जनहित याचिका का कोई औचित्य नहीं है। सुनवाई के बाद मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने साफ किया कि इस्तीफा देने वाले 14 पूर्व विधायकों ने चुनाव जीतकर नए सिरे से मंत्री पद की शपथ ले ली है। जबकि चुनाव हारने वाले मंत्री पद छोड़ चुके हैं। लिहाजा, जनहित याचिका औचित्यहीन हो चुकी है। अब इस पर आगे सुनवाई की जरूरत न समझते हुए इसका पटाक्षेप किया जाता है। 

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