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सोयाबीन की फसल को पीली पड़ने से बचाने क्या करें, वैज्ञानिकों की सलाह / SOYBEAN TIPS

वर्तमान समय में विभिन्न क्षेत्रों में भारी वर्षा हो रही है, जिससे सोयाबीन की फसल पीली पडऩे एवं सूखने की स्थिति बन रही है। कृषि विभाग के वैज्ञानिकों द्वारा इस समस्या के प्रमुख कारण एवं नियंत्रण के उपाय की सलाह दी गई है।

सोयाबीन की फसल पीली क्यों पड़ जाती है, क्या बीमारी होती है

उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास श्री केपी भगत ने बताया कि सोयाबीन में तना मक्खी एवं गर्डल बीटल का प्रकोप सामान्य से अधिक होने से सोयाबीन पीली पडऩे की संभावना है। सेमीलूपर की दूसरी पीढ़ी की इल्लियों का भी प्रकोप दिखाई दे रहा है, जो पत्तियों के साथ-साथ फल्लियों को भी क्षति पहुंचा रही है। यह समस्या जल्दी पकने वाली प्रजातियों में ज्यादा देखी जा रही है, जो कि परिपक्वता की स्थिति में है। 

सोयाबीन में यदि इल्ली 25 प्रतिशत तक घुस गई है तो क्या होगा

इसके अतिरिक्त जहां भी तना मक्खी की इल्ली ने तने में 25 प्रतिशत से अधिक सुरंग बना ली है और जहां गर्डल बीटल की इल्ली पूर्ण विकसित (लगभग पौन इंच) हो गई है। वहां रसायनों के छिडक़ाव के पश्चात् भी आर्थिक लाभ होने की संभावना कम है।

सोयाबीन तना मक्खी एवं गर्डल बीटल को रोकने क्या करें

तना मक्खी एवं गर्डल बीटल के नियंत्रण हेतु कृषक बीटासायफ्लुथ्रिन+ इमिडाक्लोप्रिड 350 मि.ली./हे. या थायमिथोक्सम+लेम्बड़ा सायहेलोथ्रिन 125 मि.ली./हे. का छिडक़ाव करें। जहां केवल सेमीलूपर इल्लियों का प्रकोप हो रहा है, वहां हेम्बड़ा सायहेलोथ्रिन 4.9 एस.सी. (300 मि.ली./हेक्टे.) या इन्डोक्साकार्ब (333 मि.ली./हेक्टे.) या फ्लूबेन्डियामाइड 39.25 एस.सी. (150 मि.ली./हेक्टे.) या फ्लूबेन्डियामाईड 20 डब्ल्यू.जी. (275 मि.ली./हेक्टे.) का छिडक़ाव करें।

सोयाबीन जड़ सडऩ एवं तना सडऩ नामक रोगों के नियंत्रण के लिए क्या करें

जड़ सडऩ एवं तना सडऩ नामक रोगों के नियंत्रण हेतु टेबूकोनाझोल (625 मि.ली./हेक्टे.) अथवा टेबूकोनाझोल+सल्फर (1 कि.ग्रा./हे.) अथवा पायरोक्लोस्ट्रोबीन 20 डब्ल्यू.जी. (500 ग्राम/हेक्टे.) अथवा हेक्जाकोनाझोल 5 ई.सी. (800 मि.ली./हेक्टे.) से छिडक़ाव करें।
सोयाबीन की फसल अब लगभग 70 दिन की और घनी हो चुकी है, अत: रसायनों का अपेक्षित प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए 500 लीटर पानी प्रति हेक्टे. का प्रयोग अवश्य करें।
जिन क्षेत्रों में अभी भी जल भराव की स्थिति है, वहां शीघ्रातिशीघ्र अतिरिक्त जल निकासी की समुचित व्यवस्था करने की सलाह दी गई है। कृषकगण अधिक जानकारी हेतु स्थानीय कृषि अधिकारी या कृषि वैज्ञानिक से सम्पर्क कर सकते हैं।


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