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क्या संसद के नेत्रों पर भी आवरण है ? / EDITORIAL by Rakesh Dubey

कल ३० जून को  अन्तर्राष्ट्रीय संसद दिवस था| कोरोना दुष्काल में देश के लोगों की आवाज का प्रतिनिधित्व संसद और विधानसभाओं  की भूमिका याद आई । सर्व शकितमान इन संस्थाओं की भूमिका इस दौरान वैसी नहीं रही जिसकी भारत के नागरिक अपेक्षा करते थे | कोरोना तो ब्रिटेन  में भी था,वहां की संसद ने मास्क,फिजिकल डीस्तेंसिंग के पालन का प्रचार ही नहीं किया बल्कि उस सब को अपनाते हुए अपने कर्तव्य को निभाया भी |  भारत में संसद और कई राज्यों की विधानसभा संचार के इन आधुनिकतम साधनों से लैस है पर किसी ने इस दुष्काल में देश की जनता के दुःख को साझा करने की जहमत नहीं उठाई | अधिकांश जन प्रतिनिधि आपदा को अवसर में बदलते दिखे | उनका एक ही लक्ष्य था इस आपदा से  अगले चुनाव का “वोट-बैंक” कैसे बने ?

मध्यप्रदेश के भोपाल संसदीय क्षेत्र में इस दौरान सेवा के स्थान पर कुश्ती का नजारा मिला | भोपाल की सांसद बीमारी या अन्यान्य कारणों से अपने संसदीय क्षेत्र में नहीं रही | उनके लापता होने के पोस्टर भी लगे, उनके हाथों पराजित प्रतिपक्षी उम्मीदवार ने खुले आम अगले चुनाव में जीतने और क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की घोषणा ही नहीं की मौके का पूरा लाभ भी उठाया | ख़ैर ! यह सब तो राजनीति में होता ही है, पर संसदीय संस्थाओं इतनी बड़ी त्रासदी पर अपने नेत्र मूंदे रखना, परिचायक है प्रजातंत्र के मुक्कमल न होने का |   

संसद और विधानसभा प्रजातंत्र में नागरिकों के अधिकारों और अस्मिता और सम्मान की संरक्षक हैं | उनका काम केवल सदन में चर्चा के बाद कानून को पारित करना, कानूनों और नीतियों को लागू करना और बजट के आवंटन  पर ही समाप्त नहीं होता है । सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाना भी तो उनकी ही जिम्मेदारी है। संसद और विधानसभा का काम सरकार द्वारा बनाई उन सभी नीतियों की निगहबानी भी है| जिससे सभी देशवासियों को लाभ मिले, विशेषकर समाज के वंचित वर्ग के लोगों को। क्या हमारी संसदीय संस्था इस दुष्काल में ऐसे ही काम कर रही थी ?इसका उत्तर किस से पूछे ?

संसदीय ज्ञान में निष्णात मेरे एक मित्र ने इस दौरान मुझे एक जानकारी भेजी | ”हाउस ऑफ कॉमंस ने २२  अप्रैल को दूर संपर्क के जरिए अपनी पहली बैठक की है ।प्रधानमंत्री का प्रश्नकाल नई शैली में होते हुए देखना एक सुखद अनुभव था। न कोई शोर न व्यवधान,  प्रधानमंत्री की ओर से भार साधक मंत्री ने जवाब दिए। सदन में कोरम के लिए जरूरी सदस्य संख्या मौजूद थी । अध्यक्ष, सदन के क्लार्क और सदस्य गण अपेक्षित भौतिक दूरियां बनाकर सैनिटाइज किए माहौल में बैठे हुए थे। पूरी गंभीरता और तल्लीनता के माहौल में बाकी सदस्य अपने घरों या दफ्तर से इस टेली बैठक में जुड़े हुए थे। स्क्रीन पर नाम सहित उनके परिचय प्रदर्शित हो रहे थे, सदन की कार्यवाही का रिकॉर्ड रखा जा रहा था। अधिकारीगण भी इसी तरह जुड़ कर अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे थे।“ हम अनेक मामलों में ब्रिटेन से उदहारण लेते हैं | यह भी कहें तो गलत नहीं होगा, हमने बहुत कुछ उनसे लिया पर सारा अच्छा  नहीं अपनाया | बहुत सा छोड़ दिया और जो विकसित किया उसका लक्ष्य वोट बैंक, कुर्सी और और सामने वाले की आलोचना तक सीमित रखा |

ये सारे करतब संसद और विधानसभा के बाहर और भीतर कभी भी दिख जाते हैं | सदन साक्षी होता है पर चुप रहता है | शक्तिशाली सदन स्वमेव कुछ करने की स्थिति में नहीं होता | 

भारतीय लोकतंत्र में ये ही जनता की सर्वोच्च संस्थाये है। इन्हीं के माध्यम से आम लोगों की संप्रभुता को अभिव्यक्ति मिलती है। ये ही प्रमाणित करती हैं कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था में जनता सबसे ऊपर है, जनमत सर्वोपरि है। संसदीय शब्द का अर्थ ही ऐसी लोकतंत्रात्मक राजनीतिक व्यवस्था है जहां सर्वोच्च शक्ति जनता के प्रतिनिधियों के उस निकाय में निहित है, जिसे हम संसद कहते हैं। भारत के संविधान के अनुसार संघीय विधानमंडल को संसद कहा गया है। संसद ही वह धुरी है, जो देश के शासन की नींव है।

आज हम दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र के ऊपर नस्लीय, धार्मिक उन्माद और तानाशाही खतरे को मंडराते देख रहे हैं। ऐसे में अगर दुनिया में लोकतंत्र को मजबूती से पनपाना है तो दुनिया भर की संसद को लोकतंत्र की आधारशिला के रूप में मजबूत, पारदर्शी और जवाबदेह होने की जरूरत है। सबसे पहले भारत में, यहाँ की संसदीय संस्थाए जागरूक कही जाती हैं, उनके नेत्रों पर कोई आवरण भी नहीं है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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