सोशल मीडिया और फर्जी खबरें | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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सोशल मीडिया और फर्जी खबरें | EDITORIAL by Rakesh Dubey

दिल्ली में हुए दंगों से पहले और बाद में सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें [फेक न्यूज] ही सबसे ज्यादा देखने को मिली । आज हालात ये हैं कि हर व्यक्ति कहीं न कहीं से सोशल मीडिया से गलत समाचार हासिल करता  रहा है और बिना विचारे उसका प्रसारण करके उसे आगे बढ़ा देता है। इसका गलत फायदा वे लोग उठा रहे हैं, जिनका स्वार्थ जुड़ा है।   देश और समाज फर्जी खबरों की बड़ी कीमत चुका रहे हैं। समस्या यह है कि फर्जी खबरों से निपटने के लिए हमारे पास कोई खास कानून नहीं है। आधे अधूरे विकल्प सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी ऐक्ट) व भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) के प्रावधानों के रूप में उपलब्ध हैं।

मजेदार बात यह है कि फर्जी वीडियो या खबरों को प्रसारित करके लोगों को उकसाने वालों पर कानूनी प्रावधान लागू ही नहीं होता। वर्ष २००८ में आईटी एक्ट धारा ६६ -ए के तहत लोगों को गुमराह करने वाली जानकारियों का प्रचार-प्रसार दंडनीय अपराध तय किया गया था। मगर २०१५  में सर्वोच्च न्यायालय ने जनहित याचिकाओं को स्वीकार करते हुए इसे असांविधानिक घोषित कर दिया। अब आईटी एक्ट की धारा ६७ के तहत पुलिस जरूर कार्रवाई कर सकती है, लेकिन यह प्रावधान मूलत: अश्लील सामग्रियों के ऑनलाइन प्रकाशन-प्रसारण के संदर्भ में है।

वस्तुत:फर्जी खबर से  तात्पर्य है है, फर्जी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का निर्माण । जब कोई इसे तैयार करता है, तो भारतीय दंड विधान की धारा-४६९  के तहत उस पर मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। मगर यह प्रावधान तब लागू होता है, जब उस फर्जी खबर से किसी की मानहानि हो। हालांकि इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का इस्तेमाल करके किसी के साथ यदि धोखाधड़ी की जाती है, तो वह कहीं ज्यादा गंभीर व दंडनीय अपराध माना जाता है। तब आईपीसी की धारा-४६८  के तहत मामला दर्ज किया जाता है, जिसमें सात साल तक के कारावास का प्रावधान है। लेकिन बीते कुछ समय से यह देखने में आया है कि पुलिस भारतीय दंड विधान  की  धारा-४६८  या ४६९ का इस्तेमाल नहीं करती।

अब यह प्रवृत्ति गंभीर चुनौती के रूप में अपने पांव भारत में  पसार चुकी है। तकनीक झूठ को इतना ताकतवर बना देती है कि नंगी आंखों से उसकी पहचान करना मुश्किल हो जाता है। अब किसी वीडियो में आवाज आदि बदलकर उसे इस तरह से नया रूप दिया जाता है  आम आदमी के लिए उसे झुठलाना असम्भव होता जा रहा है । अव्वल तो देश में फर्जी खबरों से लड़ने के लिए कानून का अभाव है, फिर तकनीक दिनोंदिन उन्नत हो रही है, नतीजतन असामाजिक तत्व निर्भीक होकर इंटरनेट पर अपना एजेंडा चलाते हैं। देश के नीति-नियंताओं को यह संकल्प लेना होगा कि भारत को हम फेक न्यूज या डीप फेक की प्रयोगशाला नहीं बनने देंगे। अब इन पर अंकुश लगाना बहुत जरूरी हो गया है।

आगे इसके इतने घिनौने रूप आएंगे कि हमारा आपसी सौहार्द खत्म हो सकता है। आदर्श स्थिति तो यह है कि इन सबको रोकने के लिए खास कानून बनाया जाए और फर्जी खबरों के प्रकाशन-प्रसारण को घिनौना दंडनीय अपराध घोषित किया जाए।

अभी विकल्पहीनता की स्थिति में इंटरनेट सेवा रोक देने जैसे उपाय अपनाए जाते हैं। मगर यह ठोस समाधान नहीं है। बल्कि यह कदम कितना नुकसानदेह हो सकता है| भारत में तो अब जीवन जीने के मौलिक अधिकार में इंटरनेट का इस्तेमाल शामिल कर लिया गया है। ऐसे में, बहुत ज्यादा दिनों तक इंटरनेट सेवा बंद रखना संभव नहीं। इलेक्ट्रॉनिक जानकारी जरूर रोकी जा सकती है, मगर वह भी तब, जब देश की अखंडता, प्रभुता और सुरक्षा के लिहाज से ऐसा करना आवश्यक हो, सार्वजनिक कानून-व्यवस्था को खतरा हो या फिर किसी कानून के उल्लंघन को रोकने की जरूरत पड़े। फिर, सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जरूरी हो गया है कि इंटरनेट बंद करते ही सरकार को  इसकी वजह बताना होगी |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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