अब गुड़ियों का नहीं, बन्दूकों का बाज़ार है | EDITORIAL by Rakesh Dubey
       
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अब गुड़ियों का नहीं, बन्दूकों का बाज़ार है | EDITORIAL by Rakesh Dubey

बुढ़ापे में खिलौने के बाज़ार जाने का एक अजब सुख है। अपनी पोती के लिए बोलने वाले तोते [खिलौना]  तलाशते हुए पता लगा अब खिलौने का बाज़ार जैसी कोई चीज नहीं बची है। कुछ खुलती बंद होती व्यापार बदलती दुकानें हैं। दुकानदार अमेजान और अन्य ऑन लाइन सेवा और उससे ज्यादा चीन में बने खिलौनों से त्रस्त हैं। अब नानी की गुड़िया या दादी का गुड्डा बना बनाया नहीं मिलता। ससुराल जाती बुआ या मौसी निशानी में अपने खिलौने छोड़कर नहीं जाती। एक पारिवारिक मित्र की पांच साल की नातिन से भी मुलाकात दिलचस्प रही। ये बच्ची थ्री-डी मैगनेटिक टाइल्स से अपना घर बनाने में जुटी है उसे यह घर बनाने में दस दिन लगने वाले हैं। यह खिलौना अमेजान के मार्फत अमेरिका से आया है।

खिलौनों में बच्चे के लिए बहुत विकल्प नहीं हैं


भारत में तथाकथित कल्पनाशीलता वृद्धि के नाम इन दिनों जो खेल बच्चों को जबरन थमाए जाते हैं उनमें भोलापन, जिज्ञासा, सरल ज्ञान, सरल गणित और बाल मनोविज्ञान नहीं होता। मशीन या रेखा गणित के जटिल सवाल होते हैं। अब खिलौनों की दुकानें भी बहुत कम हैं। फिर यहां बच्चे के लिए बहुत विकल्प नहीं हैं। या तो बार्बी मिलती है या टीवी और इंटरनेट पर दिखाए जाते कार्टून कैरेक्टर तरह-तरह की बंदूकें सुलभ हैं इसके बाद महंगी कारों की नकल। आज भारत के बाजार चीन में बने खिलौनों से पटे हुए हैं, जिनके बारे में आम धारणा यही है कि उनकी गुणवत्ता हर तरह से बहुत खराब है।

बच्चे जिन खिलौनों से खेल रहे हैं, वे कितने सुरक्षित हैं


एक दूसरा सच यह भी है कि समय के साथ खिलौनों की बहुत सी दुकानें भी गायब होती गई हैं। जहां हैं भी, तो वे बहुत छोटी हैं और उनमें खिलौनों के विकल्प भी कम हैं। अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों के खिलौने बहुत महंगे हैं। जिस घर बनाने वाली टाइल्स के बारे में ऊपर लिखा है, उसकी कीमत तीन हजार से पांच हजार रुपये है। कुछ खिलौने 14 हजार रुपये तक के हैं। मामूली गुडि़या तक सात-आठ सौ रुपये की आती है। इतने महंगे खिलौने भारत की बहुसंख्यक आबादी नहीं खरीद सकती लेकिन इस सबसे भी बड़ी समस्या यह है कि किसी को यह नहीं मालूम कि हमारे बच्चे जिन खिलौनों से खेल रहे हैं, वे कितने सुरक्षित हैं।

खिलौनों के बहाने घर एक छोटा वर्कशाप हो जाता था

हमारे देश में पहले कपड़े के, घर में बने खिलौने ही चलन में होते थे जिनके साथ दादी, नानी, बुआ मौसी का स्नेह और उर्जा जुडी होती थी। इनमे गुड़िया, शेर, चीते, भालू, हाथी, बत्तख, गुजरिया, मोर, खरगोश आदि होते थे और जीवंत लगते थे। इन्हें बनाने में घर की महिलाओं की कलाकारी, लड़कियों को दिया जाने वाला पारिवारिक ज्ञान, अपने पर्यावरण, पशु-पक्षियों से नजदीकी और पुराने कपड़ों का पुनर्प्रयोग सिखाने के लिए घर एक छोटा वर्कशाप होता था। 

खिलौनों के बहाने बच्चे अपना पर्यावरण, संस्कृति सीख जाते थे

सूती कपड़े से बने खिलौनों से बच्चों को किसी प्रकार समस्या की आशंका भी नहीं होती थी। बाजार में भी जो खिलौने मिलते थे, वे गृह उद्योगों के ही उत्पादन थे, किसी बड़े उद्योग या विदेश के तो बिलकुल नहीं। मिट्टी, लकड़ी, भूसे, नारियल तथा तमाम स्थानीय चीजों से भी खिलौने बनते थे। एक और खास बात थी कि उत्तर भारत की गुड़िया के नाक-नक्श और पहनावा दक्षिण भारतीय गुडि़या से अलग होता था। खिलौने बरतन भी तरह-तरह के होते थे। मिट्टी, जूट लकड़ी, पीतल, कांसे, लोहे से बने। इसी तरह पेड़, पौधे और वनस्पतियां भी बनाई जाती थीं। ये सब खिलौने न केवल बच्चों की कल्पना शक्ति को बढ़ाते थे, बल्कि अपने आसपास से सचेत करते थे। इन तक हर बच्चे की पहुंच सुलभ थी।

पहले खिलौनों में विविधता भी होती थी, सीमा और रानी बिटिया की गुड़िया एक जैसी नहीं होतीं थीं

अब दशा गभीर है बड़े उद्योगों में प्लास्टिक और रसायनों से तैयार आकर्षक खिलौनों ने इस समीकरण को बदल दिया है। पहले खिलौनों में विविधता भी होती थी, अब तो एक लॉट निकलता है। अब हाल यह है कि न केवल अपने देश में बल्कि विदेश से आयात होने खिलौनों की गुणवत्ता काफी खराब है। खासकर चीन से आने वाले खिलौनों को लेकर काफी आशंका जताई जाती रही है, लेकिन यह भी सच है कि खिलौनों का सबसे ज्यादा आयात भी वहीं से हो रहा है। इस समय बाजार में बिकने वाले 67 प्रतिशत खिलौने सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को पूरा नहीं करते। चाहे वे प्लास्टिक से बने हों या कि सॉफ्ट टॉयज हों, उन्हें बनाने में मानकों को अक्सर दरकिनार कर दिया जाता है।

क्या ऐसा नहीं हो सकता कि देश में सिर्फ अच्छे और सुरक्षित खिलौने ही बिकें ? खिलौनों से जुड़ा संगीत आज भी कालजयी है। मेरी  पोती अब भी “सात समन्दर पार से गुड़ियों के बाज़ार से” वाला गीत सुनकर प्रसन्न होती है, उसे नहीं मालूम गुड़ियों का बाज़ार मर गया है अब तो बन्दूकों का बाज़ार है वहां।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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