वायु प्रदूषण: जरूरत है, आज ही संभलने की | EDITORIAL by Rakesh Dubey

भोपाल। भोपाल हो या दिल्ली हर दिन प्रदूषण के आंकड़े डरा रहे हैं। भारत के कुछ शहर विश्व में अपने बढ़ते प्रदूषण के कारण कुख्यात होते जा रहे हैं। सरकार से ज्यादा नागरिकों को चेतने और कुछ करने की जरूरत है। प्रदूषण का सबसे ज्यादा नुकसान नागरिकों को ही झेलना होगा। भोपाल में निर्माण की ऐसी योजनायें चल रही हैं जो विकास के नाम पर सालों से मौजूदा पेड़ों की सफाई कर रही है। सरकार चुप है, और आम जनता की कोई सुनने वाला नहीं है। मध्यप्रदेश विधानसभा तो खुद ऐसे विध्वंस को संरक्षण देती प्रतीत हो रही है।

हाल ही में हए एक अध्ययन की मानें, तो अब तक इस असर की भयावहता का जो आकलन है। उससे कहीं बहुत अधिक नुकसान जहरीली हवा से हो सकता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल में प्रकाशित शोध में कहा गया है कि शरीर की लगभग हर कोशिका प्रदूषित वायु से प्रभावित हो सकती है। इस अध्ययन का एक मुख्य आधार हवा में प्रदूषण की मात्रा बढ़ने के साथ अस्पतालों में मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी है। भोपाल गैस त्रासदी से विश्व परिचित है। जो कुछ हरियाली शेष है उस पर तथाकथित विकास की नजर लग गई है भोपाल और अन्य शहरों को इस अध्धयन से सबक लेना चाहिए।

इस अध्धयन में यह भी पाया गया है कि प्रदूषण बढ़ने से मरने वालों की तादाद भी बढ़ती है। तथा उपचार पर खर्च में भी वृद्धि होती है। हमें पहले से इस बात की जानकारी है कि हृदयाघात, मस्तिष्क कैंसर, गर्भपात, मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं, फेफड़े की बीमारियों आदि की एक वजह जहरीली हवा में सांस लेना भी है। हमारे देश के नीति-निर्धारकों को ऐसे अध्ययनों का गंभीरता से संज्ञान लेना चाहिए, क्योंकि दुनिया के सबसे अधिक प्रदूषित शहर भारत में ही हैं। पिछले कुछ समय से उत्तर भारत समेत देश के अनेक हिस्सों में हवा में प्रदूषण की मात्रा लगातार बेहद खतरनाक स्तर पर बनी हुई है। प्रदूषित क्षेत्र में करोड़ों लोग बसते हैं और इन इलाकों में अन्य प्रकार के प्रदूषणों व संक्रमणों की समस्या भी चिंताजनक है।

आर्थिक रूप से कम विकसित होने तथा स्वास्थ्य सेवाओं की लचर व्यवस्था जैसी चुनौतियों का सामना भी ऐसे क्षेत्र के निवासियों को करना पड़ता है। हालांकि केंद्र व राज्य सरकारों ने वायु प्रदूषण की रोकथाम के लिए पहलकदमी की है और न्यायालयों ने भी इस मसले पर कड़ा रुख अपनाया है, किंतु ठोस नीतिगत पहलों, दीर्घकालिक योजनाओं और नागरिक प्रशिक्षण तथा ज्ञान का स्पष्ट अभाव है। पर्यावरण से जुड़ी अन्य समस्याओं की तरह प्रदूषण के भी अनेक कारण हैं और इस पर नियंत्रण पाना किसी एक या कुछ राज्य सरकारों के वश की बात नहीं है। इस सबमे नागरिक चेतना का जुड़ाव जरूरी है।

सही मायने में एक केंद्रीकृत प्रयास की आवश्यकता है। जो विभिन्न राज्यों व संस्थाओं के बीच समन्वय, संतुलन और निर्देशन की भूमिका निभा सके। राज्यों के बीच समुचित सहभागिता न होने का एक उदाहरण हम दिल्ली व आसपास के इलाकों में प्रदूषण बढ़ने के मामले में दिल्ली और पड़ोसी राज्यों में तालमेल के अभाव के रूप में देख सकते हैं। इसी तरह से ऐसे कई राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड समय पर न तो रिपोर्ट देते हैं और न ही उनके कामकाज में सक्रियता रहती है। मध्यप्रदेश प्रदूषण निवारण मंडल भोपाल में ऐसी ही नकारात्मक भूमिका की मिसाल है।

दुर्भाग्य से करोड़ों लोगों की जान खतरे में डालनेवाली समस्या को लेकर भी आरोप-प्रत्यारोप और दलगत राजनीति के पचड़े में समय एवं सामर्थ्य को बर्बाद कर दिया जाता है। आज जरूरत इस बात की है कि केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के साथ राज्यों के बोर्डों को अधिकार व संसाधन देकर जवाबदेह भी बनाया जाए। वायु प्रदूषण पर अंकुश नहीं लगाया गया, तो इससे हमारे वर्तमान के साथ भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लग जायेगा।जरूरी ही आज संभल जाएँ।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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