Loading...

इंदौर आई हॉस्पिटल में फिर होगा इलाज | INDORE NEWS

इंदौर। इंदौर आई हॉस्पिटल (Indore Eye Hospital) एक बार फिर खुलने का रास्ता साफ हो गया। कोर्ट ने अस्पताल का लाइसेंस बहाल करते हुए CMHO द्वारा 17 अगस्त 2019 को दिया गया आदेश निरस्त कर दिया। कोर्ट ने माना कि सुनवाई का अवसर दिए बगैर कार्रवाई की गई थी। न कारण बताओ नोटिस जारी किया, न प्रक्रिया का पालन किया। कोर्ट इसके पहले बिल्डिंग और परिसर पर कब्जा करने को लेकर दिया गया कलेक्टर का आदेश भी निरस्त कर चुकी है। 

इंदौर आई हॉस्पिटल में मोतियाबिंद का ऑपरेशन कराने के बाद 15 मरीजों की आंखों की रोशनी चली गई थी। आरंभिक जांच में सामने आया था कि ऑपरेशन के दौरान हुए संक्रमण के कारण रोशनी गई है। कुछ मरीजों को इलाज के लिए सरकारी खर्च पर चेन्नई भी भेजा गया था, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। आरंभिक रूप से अस्पताल की लापरवाही सामने आने के बाद 17 अगस्त 2019 को सीएमएचओ इंदौर ने अस्पताल का लाइसेंस निरस्त कर दिया था। उधर, कलेक्टर ने चार अक्टूबर को अस्पताल भवन और परिसर को कब्जे में लेने का आदेश जारी कर दिया। बाद में जिला प्रशासन ने कब्जा ले भी लिया। प्रशासन का दावा था कि अस्पताल बगैर लीज जमा किए सरकारी जमीन पर चल रहा है। इस पूरी कार्रवाई को चुनौती देते हुए अस्पताल प्रबंधन ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर दी।

अस्पताल प्रबंधन की तरफ से सीनियर एडवोकेट एके सेठी और एडवोकेट योगेश मित्तल ने कोर्ट को बताया कि बगैर सुनवाई का अवसर दिए अस्पताल का लाइसेंस निरस्त किया गया। जिन गवाहों के बयानों को आधार बनाकर कार्रवाई की गई, उनके प्रतिपरीक्षण का अवसर भी नहीं दिया गया। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था जो हाल ही में जारी हुआ। कोर्ट ने माना कि लाइसेंस निरस्त करने की कार्रवाई में प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। शासन ने अस्पताल प्रबंधन को अपना पक्ष रखने के लिए कोई नोटिस भी जारी नहीं किया। इस पर जस्टिस वंदना कसरेकर ने सीएमएचओ का आदेश निरस्त कर दिया।

कोर्ट ने गड़बड़ी मानी 

लाइसेंस निरस्त करने से पहले न कारण बताओ नोटिस जारी किया गया न अस्पताल प्रबंधन को सुनवाई का मौका दिया गया। प्रावधानों के मुताबिक एक महीने का नोटिस दिया जाना था। वह भी नहीं दिया। मामले की जांच के लिए 17 अगस्त को कमेटी गठित की गई थी। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट 20 अगस्त को दी थी। यानी लाइसेंस निरस्त करने के बाद। इस मामले में गवाहों के बयान भी दर्ज किए गए थे, लेकिन उन गवाहों के प्रतिपरीक्षण का कोई अवसर इंदौर आई हॉस्पिटल को नहीं दिया गया।