जरूरी है, देश की अर्थव्यवस्था पर श्वेत पत्र | EDITORIAL by Rakesh Dubey

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नई दिल्ली। देश के आर्थिक मोर्चे से कोई ऐसा समाचार नहीं मिल रहा है, जिससे कुछ राहत की साँस मिले |आर्थिक वृद्धि धीमी है। निर्यात गिर रहा है, खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ रही है, रोजगार बढ़ नहीं रहे हैं और बैंक ऋण की वृद्धि कम हो रही है। बिजली का उपयोग कम हुआ है और कर राजस्व में वृद्धि की गति धीमी हुई है। कर राजस्व की वृद्धि दर तो बजट में जताए गए अनुमान से काफी कम है। ऐसे में चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल है।

सरकार ने पिछले दिनों कुछ आवश्यक कदम भी उठाए हैं। जैसे कॉर्पोरेशन कर की दर में कमी, आवास, अचल संपत्ति, वाहन और निर्यात क्षेत्र को गति प्रदान करने के लिए पैकेज आदि। देश का आर्थिक निराशा के दौर से उबरना शेष है। सवाल यह है सरकार को क्या करना चाहिए? सरकार बुनियादी क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश, आयकर दरों में बदलाव, नीतिगत सुधार और निजीकरण की बात कहती हैं। इन उपायों से मदद मिलेगी लेकिन तात्कालिक असर नहीं होगा। आर्थिक वृद्घि के आंकड़ों में सुधार सुनिश्चित करने के पहले जरूरी है कि अर्थव्यवस्था की गिरी हुई मनोदशा में सुधार किया जाए।

सबसे पहले सरकार को अर्थव्यवस्था की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। सरकार, थिंकटैंक और रेटिंग एजेंसियों समेत तमाम अन्य संस्थानों के सदस्यों ने समस्या की प्रकृति और अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को लेकर अलग-अलग राय है। बाजार और उद्योग जगत इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि उन्हें किस बात को स्वीकार करना चाहिए और किसे खारिज। अनिश्चितता ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक माहौल तैयार करने में मदद की है। ऐसे में सरकार के लिए यह उचित समय है कि वह बताए कि देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और संभावनाएं क्या हैं? ऐसा दस्तावेज सहज तैयार किया जा सकता है। यह काम किसी स्वतंत्र अर्थशास्त्री द्वारा किया जाता है तो सरकार की विश्वसनीयता बढ़ेगी । यह रिपोर्ट सरकारी अर्थशास्त्रियों, विशेषज्ञों और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की सहायता से तैयार की जा सकती है। विजय एल केलकर की रिपोर्ट को याद कीजिए। 2012 की तरह आज देश को एक रिपोर्ट की आवश्यकता है।

अर्थव्यवस्था की स्थिति पर श्वेत पात्र सामने आने से ऐसी तमाम अटकलबाजी पर रोक लग जाएगी। आंकड़े बजट में जारी करने के बजाय बेहतर होगा कि बुरी खबर सामने लाने के लिए श्वेत पत्र का सहारा लिया जाए। इससे बजट में उन नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा जिनमें सुधार की जरूरत है। इसके साथ ही उसमें जरूरी नए व्यय पैकेज भी पेश किए जा सकेंगे। वित्त मंत्री वित्तीय तंत्र में उत्पन्न तनाव की बात स्वीकार करके तथा अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधारने की बात दोहरा कर श्वेत पत्र के प्रयासों का पूरक प्रयास कर सकती हैं।

अभी सरकार को चाहिए कि वह आर्थिक मंदी से मुंह न चुराए। कुछ माह पहले एक सरकारी सर्वेक्षण में ही दर्शाया गया था कि अर्थव्यवस्था में रोजगार वृद्घि में भारी गिरावट आई है। सरकार की पहली प्रतिक्रिया में कहा गया कि ये निष्कर्ष सर्वेक्षकों के प्रारंभिक नतीजे हैं। कुछ महीने बाद सरकार ने स्वीकार किया कि वह रिपोर्ट अंतिम थी। कुछ दिन पहले सरकार ने उपभोक्ता व्यय पर अपने ही सर्वे को खारिज करने का निर्णय किया क्योंकि आंकड़ों में कुछ दिक्कत थी। आर्थिक मंदी से निपटने के लिए केवल निवेश बढ़ाना और नीतिगत सुधार करना पर्याप्त नहीं है। सरकार अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करे और आर्थिक आंकड़ों तथा सर्वे के नतीजों को स्वीकार करे। निवेशक अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर पारदर्शिता पसंद करते हैं। आज वे ऐसे किसी भी कदम का स्वागत करेंगे जिसमें अर्थव्यवस्था को लेकर श्वेत पत्र शामिल है ।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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