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शिवपुरी में शिक्षकों के अवकाश पर पाबंदी, पटवारियों को खुली आजादी क्यों | KHULA KHAT

श्रीमान मैं बताना चाहता हूं कि शिवपुरी जिले में शिक्षा विभाग के शिक्षक बर्तमान में आपात काल जैसी परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं। वैसे तो शिवपुरी में शिक्षा विभाग के अधिकारी ही हमेशा से कुछ न कुछ ऐसा करते रहते हैं जिससे जिला चर्चा में बना रहता है, चाहे अभी हाल ही में निवर्तमान डीईओ महोदय द्वारा एक चहेते सहायक शिक्षक को एपीसी का पद देने का प्रकरण हो (जबकि सहायक शिक्षक एपीसी पद की योग्यता नहीं है), या आरएमएसए शिवपुरी एवं उत्कृष्ट शिवपुरी के प्राचार्य द्वारा छुट्टी वाले दिन ही ट्रैनिंग कराने का फितूर हो (जो कि 13 अक्टूबर 2019 को होनी है)।

कलेक्टर महोदया ने एक नया फरमान जारी किया है

अब इस क्रम में शिवपुरी कलेक्टर भी जुड़ गई हैं, वो अपने अधीनस्थों से भी दो कदम आगे निकल गई है। कलेक्टर महोदया ने एक नया फरमान जारी किया है कि शिक्षकों की छुट्टी का आवेदन अति आवश्यक होने पर ही स्वीकृत किया जाए और आवेदन भी शिक्षक को संकुल प्राचार्य से ही स्वीकृत कराना होगा अन्यथा की स्थिति में शिक्षक के निलंबन की कार्यवाही की जाएगी।

शासन ने अवकाश का अधिकार दिया है

श्रीमान शासन शिक्षकों को 13 आकस्मिक अवकाश, 3 एक्छिक अवकाश और 10 दिन का मेडिकल अवकाश प्रदान करता है। इसमें से आकस्मिक अवकाश तो केवल इसीलिए है कि वह अचानक कोई आवश्यकता पड़ने पर लिया जा सके। मेडिकल अवकाश बीमार पड़ने की स्थिति में लिया जा सकता है। एक-एक संकुल के अंतर्गत 100-200 विद्यालय हैं जिनमें से कई विद्यालय 15-20 किलोमीटर की दूरी पर हैं। शिवपुरी का मोहारी संकुल में तो 650 शिक्षक पदस्थ हैं। इसके अतिरिक्त ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षकों के रहने, इलाज़ की कोई व्यवस्था नहीं है ऐसे में वे जिला मुख्यालय या तहसील मुख्यालय से अपने साधनों से रोज अप डाउन करते है।

अवकाश स्वीकृत करने का अधिकार प्रधान अध्यापक तथा प्राचार्य को है

अब यदि किसी शिक्षक को कोई आकस्मिक काम पड जाए और वह विद्यालय न जा सकता हो तो क्या वो पहले अवकाश स्वीकृत कराने अपने घर से 30-40 किलोमीटर दूर पहले संकुल जाए, फिर स्वीकृत आवेदन को अपने स्कूल पहुंचाए, तब अपना आकस्मिक काम निपटाए और अगर वो बीमार पड़ जाए तो भी ऐसे ही प्रक्रिया पूरी करके फिर अस्पताल में भर्ती हो। जबकि पहले वह अपने विद्यालय को आवेदन भेज देता था क्योंकि अवकाश स्वीकृत करने का अधिकार प्रधान अध्यापक तथा प्राचार्य को है।

अतिआवश्यक का निर्धारण कौन करेगा

दूसरा प्रश्न अति आवश्यक होने पर ही अवकाश स्वीकृत किया जाएगा। अति आवश्यक होने का निर्णय कौन और कैसे करेगा। हो सकता है जो कार्य शिक्षक को अतिआवश्यक हो वही कार्य संकुल प्राचार्य या कलेक्टर महोदय की दृष्टी से तुच्छ हो। जिसके घर में एक ही व्यस्क पुरुष हो उसके लिए बच्चे की फीस भरना या गैस सिलेंडर लाना अतिआवश्यक कार्य होता है परंतु कलेक्टर महोदय के लिए वो तुच्छ कार्य है।

संकुल वाले नाजायज फायदा उठाते हैं

कलेक्टर महोदया के इस आदेश का संकुल प्राचार्य भी खूब नाज़ायज़ फायदा उठाने में लगे हैं, शिवपुरी के एक संकुल द्वारा इसी प्रक्रिया का उपयोग कुछ वर्ष पहले किया गया था वहां के एक शिक्षक ने जब अवकाश के लिए प्राचार्य को आवेदन दिया तो प्राचार्य द्वारा पूछा गया कि छुट्टी क्यों चाहिए, शिक्षक ने जबाब दिया कि मुझे कुछ व्यक्तिगत कार्य है परंतु संकुल प्राचार्य द्वारा उसे मजबूर किया गया तो उसने जबाब दिया कि अपनी बीबी से कई दिनों से नहीं मिला हूं, मिलने जा रहा हूं।

छुट्टी कर्मचारी का अधिकार है, उसे उससे छीना नहीं जा सकता

श्रीमान छुट्टी कर्मचारी का अधिकार है, उसे उससे छीना नहीं जा सकता। यहां तक कि चुनाव की आचार संहिता में भी वह 1 दिन का आकस्मिक अवकाश ले सकता है। मेरा सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि शिक्षकों पर ही पूरा अविश्वास क्यों? अविश्वास उस शिक्षक पर जिसको आप बीएलओ बनाते हो और जिसके बिना आप चुनाव नहीं करा सकते, बसों में धक्के खाता हुआ भूखा प्यासा चुनाव करा कर लौटता है और जिसका पूरा श्रेय आप ले जाते हैं, वह शिक्षक जो घर-घर भटक कर जनगणना करता है, वह शिक्षक जो स्वास्थ्य विभाग की एल्वेंडा ज़ोल और आयरन की गोली बच्चों को खिलाता है, वह शिक्षक जो एमडीएम का खाना रोज बच्चों को खिलाता है, वह शिक्षक जो ग्रामीण क्षेत्रों में शराबियों और बदमाशों से रोज झूझता है, वह शिक्षक जिसके पास अपनी वेतन के अलावा आय का कोई दूसरा साधन नहीं है, वो ही शिक्षक इसके बाद बच्चों को पढ़ा पढ़ा कर आपके जैसे कलेक्टर और आयुक्त बना देता है।

क्योंकि शिक्षक अन्य आय का स्रोत नहीं है

हां शिक्षक में एक सबसे बड़ी कमी है जिसके लिए वो शासन और सरकारों की नज़र में खटकता है, वह अन्य विभागों के कर्मचारियों की तरह आय का स्रोत नहीं है। एक पटवारी की उपस्थिति किसी रजिस्टर में नहीं लगती, और न ही शासन को उससे कोई समस्या है क्योंकि वह अपने से ऊपर के सभी लोगों तक आय का स्रोत है। एक राजस्व निरीक्षक को अपनी छुट्टी कलेक्टर से स्वीकृत नहीं करानी पड़ती क्योकि वो उनमें से ही एक है, ये तो घर की बात है। मुझे नहीं मालूम पर मुझे नहीं लगता है कि पटवारी को कभी आकस्मिक अवकाश लेना पड़ता होगा। 

पटवारियों पर कभी कोई पाबंदी जारी नहीं होती

तहसील कार्यालय में इंतजार करते हुए आम नागरिक को कभी ये पूछने का साहस हुआ होगा कि सुबह से तहसीलदार साहब कहाँ गायब रहे। असल में इंसान-इंसान में भी फर्क है राजस्व विभाग या अन्य विभाग में कार्य करने वाले अधिकारी ही इंसान हैं शिक्षा विभाग के शिक्षक तो इंसान ही नहीं है वे तो दुत्कारने के योग्य हैं, उनको तो मीटिंगों में बुला कर रोज अपमानित किया जाना चाहिए, उनको निलंबित करने और दंड देने का कोई भी मौका हाथ से जाना नहीं चाहिए, उनके अंदर का स्वाभिमान पूरी तरह खत्म होने तक उन्हें प्रताड़ना दी जानी चाहिए ताकि वो एक कीड़े की जिंदगी जियें और जिनके साथ खेलने और कुचलने में आत्मिक आंनद की प्राप्ति हो।मेरे हिसाब से तो अब अधिकारियों को शासन को एक-एक चावुक प्रदान किया जाना चाहिए ताकि जहां भी शिक्षक दिखे उसकी पीठ पर चावुक मारा जा सके।
संपादक महोदय आपसे उम्मीद है शिक्षकों के मन की व्यथा को आप समझ पाएंगे, और इस विषय को उठाएंगे।

धन्यबाद
कृपया नाम उजागर न करें।