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लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर LOAN लेने के फायदे और नुकसान

अचानक पैसे की जरूरत हो तो आप क्या करेंगे। 2 ही विकल्प हैं, या तो अपने परिजन से उधार पैसा ले लेंगे या फिर पर्सनल लोन जो सबसे आसान है। फटाफट पैसा मिलना इसकी मुख्य वजह है लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सबसे अच्छा विकल्प है? पर्सनल लोन जैसे महंगे विकल्प की जगह आप दूसरे विकल्पों के बारे में भी सोच सकते हैं। लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन लेने का विकल्प इनमें से एक है। आइए जानते हैं लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन लेने के फायदे और नुकसान क्या क्या हैं। 

लाइफ इंश्योरेंस पर लोन लेने के फायदे

प्रोबस इंश्योरेंस ब्रोकर्स के डायरेक्टर राकेश गोयल ने बताया कि इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन लेने के कुछ फायदे हैं। इनमें ब्याज दर कम होती है और लोन भी आसानी से मिल जाता है।

1. ज्यादा मूल्य का लोन मिलना

इंश्योरेंस पॉलिसी पर अधिकतम लोन मिलना इंश्योरेंस कंपनियों के अपने नियमों पर निर्भर करता है। अमूमन पॉलिसीधारक को पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू के 80-90 फीसदी के बराबर लोन मिल सकता है। सरेंडर वैल्यू पॉलिसी की वह वैल्यू है जो आपके स्वेच्छा से पॉलिसी बंद कराने पर आपको मिलती है। गोयल ने कहा, 'अगर आपके पास 50 लाख रुपये का इंश्योरेंस कवर है और उसकी सरेंडर वैल्यू 20 लाख रुपये है, तो इस पर 18-19 लाख रुपये तक लोन मिल सकता है।'

2. कम ब्याज दर पर लोन

इंश्योरेंस पॉलिसी पर लिए जा रहे लोन पर बीमा कंपनियों की ब्याज दर पर्सनल लोन की दरों के मुकाबले कम होती है। पॉलिसी बाजारडॉटकॉम में टर्म लाइफ इंश्योरेंस के हेड अक्षय वैद्य ने कहा कि लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन की ब्याज दर चुकाए गए प्रीमियम और इनकी संख्या पर निर्भर करती है। प्रीमियम का भुगतान जितना ज्यादा हो चुका है, ब्याज दर उतनी ही कम होगी।

3. सिक्यॉर्ड लोन

ये लोन सिक्यॉर्ड होते हैं और स्क्रूटनी की सीमित जरूरत पड़ती है। अन्य मामलों में अक्सर कर्जदाता क्रेडिट स्कोर देखता है। इस स्कोर के आधार पर ब्याज की दरें तय की जाती हैं। डिफॉल्ट की स्थिति में लोन के रीपेमेंट के लिए सिक्यॉरिटी के तौर पर इंश्योरेंस पॉलिसी को गिरवी रखा जाता है। इसलिए आपको कम ब्याज दरों पर लोन मिलता है।

इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन लेने के क्या हैं नुकसान?

प्रोबस इंश्योरेंस ब्रोकर्स के डायरेक्टर राकेश गोयल ने बताया कि इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन लेने के कुछ नुक्सान भी हैं। कंपनी केवल सरेंडर वैल्यू मंजूर करती है। इसलिए आसान नहीं। कई सारी परेशानियां एवं नियम हैं। 

1. पॉलिसी के शुरुआती वर्षों में कम लोन

माना जाता है कि पॉलिसी की बीमित राशि पर इस तरह का लोन मिलता है। हालांकि, यह सच नहीं है। आपका लोन केवल पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू पर मंजूर होता है। चूंकि अपनी लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी के तहत पॉलिसीधारक को कैश वैल्यू/सरेंडर वैल्यू जुटाने में काफी साल लगते हैं। लिहाजा, पॉलिसी के शुरुआती सालों में प्लान पर लोन सीमित होता है।

माईलोनकेयर के संस्थापक और सीईओ गौरव गुप्ता ने कहा, 'सबसे पहले आपको अपनी बीमा कंपनी से यह पूछना चाहिए कि आपकी पॉलिसी लोन के लिए पात्र है या नहीं। वैसे तो सरेंडर वैल्यू के करीब 85-90 फीसदी तक अधिकतम लोन मिलता है लेकिन, पॉलिसी के तहत ठीकठाक सरेंडर वैल्यू जुटाने में कई साल लगते हैं। लिहाजा, लोन की रकम कम हो सकती है।'

2. हर तरह की लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी पर लोन नहीं

लोन केवल ट्रेडिशनल लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियों पर मिलता है। टर्म प्लान पर यह नहीं मिलता है। ट्रेडिशनल प्लान में एंडोमेंट पॉलिसी, मनी-बैक प्लान, होल लाइफ प्लान आदि शामिल हैं। इनमें रिटर्न की गारंटी होती है। हालांकि, कई बीमा कंपनियां यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान पर भी लोन देती हैं। पॉलिसी खरीदते ही आप इस पर लोन लेने के हकदार नहीं बन जाते हैं। इसमें करीब तीन साल का वेटिंग पीरियड होता है।

3. लोन के रीपेमेंट पर डिफॉल्ट

लोन के रीपेमेंट में डिफॉल्ट या भविष्य के प्रीमियम का भुगतान करने में चूक की स्थिति में इंश्योरेंस पॉलिसी लैप्स हो जाएगी। पॉलिसीधारक को पॉलिसी पर लिए गए लोन पर ब्याज के अलावा प्रीमियम का भी भुगतान करना होगा। बीमा कंपनी पॉलिसी की सरेंडर वैल्यू से मूल और बकाया ब्याज की रकम वसूलने का अधिकार रखती है।

पॉलिसीधारकों को क्या करना चाहिए?

लाइफ इंश्योरेंस खरीदने का मकसद किसी अनहोनी में अपने प्रियजनों को वित्तीय सुरक्षा मुहैया कराना है। हालांकि, इमर्जेंसी में पॉलिसी पर लोन लेने की जरूरत पड़ ही जाती है तो इस सुविधा का इस्तेमाल बहुत थोड़े समय के लिए करना चाहिए। यह लोन तभी लेना चाहिए, जब अन्य सभी तरह के लोन के विकल्प बंद हो गए हों।