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RTI कमिश्नर राहुल सिंह ने घूसखोर तंत्र को झकझोर डाला: मामला रिटायर्ड कर्मचारी को रिश्वत के लिए प्रताड़ित करने का

भोपाल। यह बिल्कुल दहेज प्रताड़ना या महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की तरह ही संवेदनशील अपराध है। वरिष्ठ नागरिक भी कमजोर होता है। उसमें भी संघर्ष करने की क्षमता नहीं होती। उसे भी कानूनी आश्रय की जरूरत है लेकिन मध्य प्रदेश में सरकारी तंत्र अपने ही कर्मचारी को रिटायर होने के बाद प्रताड़ित करता है। जब तक वो रिश्वत (जिसे मध्य प्रदेश में अधिकारपूर्वक कमीशन कहा जाता है) ना दे दे, वो पेंशनर नहीं बन पाता। उसके पेंशन और एरियर संबंधी भुगतान अटका दिए जाते हैं। नियम कानून तो छोटी सी बात है, घूसखोर तंत्र इतना ताकतवर है कि वो हाईकोर्ट को भी मिसगाइड कर देता है। पहली बार इस रिश्वतखोर सिंडीकेट का प्रमाणित दस्तावेजों के साथ खुलासा हुआ है। आरटीआई कमिश्नर राहुल सिंह ने घूसखोर तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। 

क्या किया आरटीआई कमिश्नर राहुल सिंह ने

रीवा निवासी रिटायर्ड कर्मचारी श्रीनिवास तिवारी के मामले में मध्य प्रदेश सूचना आयुक्त राहुल सिंह ने सीधे विभाग प्रमुख पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर इन चीफ आरके मेहरा की जवाबदेही तय करते हुए दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के लिए जांच शुरू कर दी है। अब तक अधिकतम यह होता था कि रिटायर्ड कर्मचारी के प्रकरण का निपटारा कर दिया जाता था परंतु जिम्मेदारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती थी। 

2010 से चप्पलें चटका रहे थे श्रीनिवास तिवारी

आरटीआई आवेदनकर्ता लोक निर्माण विभाग में रीवा में पदस्थ रहे समय पाल श्रीनिवास तिवारी वर्ष 2010 में रिटायर हो गए थे। तब से लेकर आज तक वे अपने वेतन से संबंधित एरियर के भुगतान के लिए अपने विभाग, हाईकोर्ट और सूचना आयोग तक के दरवाजे खटखटा चुके हैं लेकिन समस्या जस की तस रही। सूचना आयुक्त सिंह ने इस प्रकरण पर आश्चर्य जताते हुए कहा कि ना वरिष्ठ अधिकारियों का आदेश। नाहीं कोर्ट का आदेश। ना ही सूचना का अधिकार कानून। सब कुछ ताक पर रख कर फाइलों पर बैठ गए है अधिकारी। 

हाई कोर्ट ने 2010 में ही आदेश दे दिया था, पालन 2019 तक नहीं हुआ

इस मामले में सबसे रोचक तथ्य यह है की हाई कोर्ट जबलपुर की डबल बेंच ने अपीलकर्ता लोक निर्माण विभाग रीवा में पदस्थ रहे समय पाल श्रीनिवास तिवारी के पक्ष में फ़ैसला दिया था पर सरकारी तंत्र के मकड़जाल में हाई कोर्ट का आदेश भी उलझ के रह गया। अपने सेवाकाल में श्रीनिवास तिवारी को कभी क्रमोन्नति प्रमोशन का लाभ नहीं मिला। इसे दुखी होकर वे हाईकोर्ट की शरण में गए हाईकोर्ट की डबल बेंच ने सन 2010 में उनके पक्ष में फैसला देते हुए सरकार को निर्देश दिया था। 

रिश्वत नहीं तो अधिकार भी नहीं

सरकार का आदेश लेकर श्रीनिवास तिवारी तत्कालीन कार्यपालन यंत्री रीवा हरि सिंह ठाकुर से मिले तो उनके कागजों को उठाकर फेंक दिया और कोर्ट के आदेश अनुसार कार्रवाई करने से साफ इंकार कर दिया। वहीं तिवारी का आरोप है कि जब वे विभाग के अनुविभागीय अधिकारी के पास पहुंचे ने तो उन्होंने वेतन एडजस्टमेंट के लिए 10 परसेंट कमिशन की मांग भी रख दी। तिवारी के मुताबिक उसने जब इस बात की शिकायत कार्यपालन यंत्री से की तो उसने एरियर्स का भुगतान करने से मना कर दिया। पेंशन और एरियर्स कर्मचारी का अधिकार होता है परंतु सिंडीकेट की हिम्मत देखिए। रिश्वत नहीं तो अधिकार भी नहीं। 

प्रमुख सचिव ने हाईकोर्ट को मिसगाइड कर दिया

इसके बाद भी जब वेतन में एरियर्स का एडजस्टमेंट नहीं किया गया तो श्रीनिवास तिवारी फिर से 2014 में हाई कोर्ट में शरण में गए और सरकार के विरुद्ध अवमानना याचिका दायर की। विभाग की तरफ से तत्कालीन इंजीनियर इन चीफ अखिलेश अग्रवाल और प्रमुख सचिव के के सिंह कोर्ट के समक्ष हाजिर हुए और कोर्ट को उन्हें बताया कि इस मामले में कार्यवाही के आदेश दे दिए गए हैं। आदेश की प्रति भी कोर्ट के समक्ष रखी गई। कोर्ट ने आदेश से संतुष्ट होते हुए प्रकरण को निराकृत मान कंटेंप्ट पिटिशन खारिज कर दिया। चौंकाने वाली बात यह है कि प्रमुख सचिव का आदेश सिर्फ हाईकोर्ट में पेश किया गया, उसका पालन नहीं किया गया। प्रमुख सचिव की पदीय जिम्मेदारी है कि वो अपने आदेश का पालन सुनिश्चित कराएं परंतु उन्होंने भी ऐसा नहीं किया।