Loading...

DAVV : कुलपति की कुर्सी खाली, अभी तक नहीं हुई नियुक्ति | INDORE NEWS

इंदौर। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में धारा-52 लगने के बाद तीसरे दिन बुधवार को भी कुलपति की कुर्सी खाली रही। सोमवार को धारा-52 लगने के बाद से विवि के नालंदा परिसर की पहली मंजिल पर बने कुलपति कक्ष पर ताला लगा था। बुधवार को विवि के अधिकारियों ने ताला खुलवाकर कुलपति कक्ष की सफाई और झाड़ू-पोछा करवाया। शाम तक इंतजार चलता रहा, लेकिन नए कुलपति की नियुक्ति का आदेश जारी नहीं हुआ। उज्जैन की तरह अब इंदौर में शासन और राजभवन की कश्मकश में कुलपति की नियुक्ति का इंतजार लंबा खींचता दिख रहा है।

कुलपति की गैरमौजूदगी में विश्वविद्यालय प्रशासन की कार्रवाई और दैनिक कामकाज प्रभावित होने लगे हैं। बुधवार को रजिस्ट्रार डॉ. अनिल शर्मा दिनभर कैबिन में मौजूद रहे। हालांकि उन्होंने नीतिगत निर्णयों से जु़ड़ी फाइलें भेजने से प्रोफेसर व मातहत अधिकारियों को मना कर दिया। इस बीच एक अधिकारी की ओर से पीएचडी की आरडीसी की बैठक बुलाने का संदेश विवि में भेजा गया। रजिस्ट्रार डॉ. शर्मा ने दोटूक कहा कि आपको पता होना चाहिए कि विवि में धारा-52 लगी है।

आरडीसी के अध्यक्ष कुलपति होते हैं, जब कुलपति ही नहीं है तो फिर बैठक कैसे बुला ली। रजिस्ट्रार नाराज हुए कि अब तक सोए थे और अब आरडीसी बुलाने की जल्दबाजी हो रही है। इस बीच कांग्रेस ने कुलपति की नियुक्ति में हो रही देरी के लिए राजभवन को जिम्मेदार ठहराया। मामले में प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सचिव व पूर्व कार्यपरिषद सदस्य तेजप्रकाश राणे ने शासन को पत्र लिखकर मांग की है कि ऐसी स्थिति में संभागायुक्त को विश्वविद्यालय के कुलपति का प्रभार दे देना चाहिए, ताकि सामान्य कामकाज प्रभावित न हो।

उज्जैन में भी हुआ था लंबा इंतजार

प्रदेश में सत्ता बदलने के बाद से विश्वविद्यालयों में नए कुलपति की नियुक्ति और नाम तय होने में देरी का सिलसिला आम होता दिख रहा है। नई सरकार ने फरवरी में उज्जैन के विक्रम विवि में कार्रवाई की थी। वहां के त्तकालीन कुलपति डॉ. एसएस पांडे ने 7 फरवरी को इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने वरिष्ठ डीन डॉ. बालकृष्ण शर्मा को कुलपति का प्रभार दे दिया। आठ दिन बाद शासन ने इस्तीफा नामंजूर करते हुए 15 फरवरी को विवि में धारा-52 लगाते हुए कुलपति को बर्खास्त कर दिया। इस बीच नए कुलपति की नियुक्ति का आदेश तुरंत जारी नहीं हो सका। राजभवन ने शासन के तीन नामों का पैनल भेजा, जिसे राजभवन ने खारिज कर दिया। दो बार की कवायद के बाद कुलाधिपति ने 10 मार्च को नए कुलपति की नियुक्ति कर दी। सूत्रों के मुताबिक नए नाम में पूरी मर्जी राजभवन की ही चली।