सिंधिया की बसपा पर सर्जीकल स्ट्राइक का औचित्य समझ से परे | MY OPINION by Dr. AJAY KHEMARIA

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सिंधिया की बसपा पर सर्जीकल स्ट्राइक का औचित्य समझ से परे | MY OPINION by Dr. AJAY KHEMARIA

डॉ अजय खेमरिया। गुना लोकसभा में बसपा प्रत्याशी को कांग्रेस के पक्ष में बिठाने की रणनीति मीडिया के लिये मसाला हो सकती है पर चुनाव परिणाम के लिहाज से यह बहुत बड़ा उलटफेर करेगी। इसे आंकड़ो के आलोक में देखे तो यह कोई खास महत्व की नही है तब जबकि कांग्रेस केंडिडेट रिकार्ड मतों से 2019 को फतह करना चाहते हो। सिंधिया के समर्थक इस बार गुना में जीत का आंकड़ा 5 लाख को लक्ष्य करके माहौल बना रहे हैं। इस प्रोजेक्शन को पिछले दो चुनावों के परिणामों के साथ विश्लेषित किया जाए तो यह तथ्य है कि बसपा की चुनावी चुनोती कभी किसी की हार जीत का निर्णायक फैक्टर नही रही है। उल्टा बसपा प्रमुख मायावती की नाराजगी ने जरूर माहौल को उस दलित वर्ग में गरमा दिया है जो मोदी भक्तो की तरह मायावती का अनुशीलन कर हर परिस्थिति में उनके साथ खड़ा रहता है। 

श्री सिंधिया के मीडिया मैनेजर इस बसपाई समर्थन को बीजेपी पर सर्जिकल स्ट्राइक करार दे रहे है लेकिन जमीनी हकीकत कहीं इस स्ट्राइक को एडवर्स न बना दे। क्योंकि मायावती द्वारा जिस तल्ख अंदाज में इस पूरे घटनाक्रम को रिएक्ट किया है उसने मप्र भर की राजनीति को प्रभावित किया है। अब हम गुना लोकसभा के आंकड़ो पर नजर डालें। 2009 में बसपा के प्रत्याशी को श्री सिंधिया के खिलाफ 4.49 प्रतिशत वोट मिले थे वहीं श्री सिंधिया को 63.6 और बीजेपी को 25 फीसदी। इसी तरह 2014 के चुनाव में बसपा को 2.81, बीजेपी को 40.57 औऱ कांग्रेस को 52.94 प्रतिशत वोट हांसिल हुए थे। आंकड़ो से साफ है कि बसपा यहां कभी मुकाबले में नही रही है।

अगर 2014 में प्रचंड मोदी लहर को छोड़ भी दें तो 2009 में भी जब यूपी में बसपा की सरकार हुआ करती थी तब भी बसपा को 5 परसेंट वोट भी हासिल नही हुए है। अब दोनों चुनाव में बसपा केंडिडेट के केन्डिडेचर पर नजर डालें तो 2009 में बसपा ने लोधी जाति के लोकपाल लोधी औऱ 2014 में पाल बघेल समाज के लाखन सिंह को टिकट दी। यानी दोनो ओबीसी के केंडिडेट न केवल बसपा के वोटर का विश्वास जीत सके न खुद की जातियों का। 2019 में भी ओबीसी के लोकेंद्र किरार बसपा केंडिडेट थे लोकसभा क्षेत्र के शिवपुरी, गुना, बमौरी, कोलारस विधानसभाओं में किरार जाती के वोटर अच्छी संख्या में है। 1996 के लोकसभा चुनाव में राजमाता सिंधिया के खिलाफ इस जाति के प्रकाश सिंह धाकड़ में बसपा के टिकट पर 90000 के लगभग वोट हासिल किए थे। यह बसपा का इस लोकसभा में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन था लेकिन यह उस दौर की बात है जब मप्र की राजनीति में किरार जाती के शिवराज सिंह चौहान जैसे आज के कद्दावर नेता का उदय नही हुआ था।

आज किरार बिरादरी खुद को काफी कुछ शिवराज के रंग में रंगा पाती है। वैसे यह भी फैक्ट है कि अंचल की यह जाती परम्परागत रूप से सिंधिया परिवार के प्रति झुकाव रखती रही है। बसपा के मौजूदा प्रत्याशी रहे लोकेंद्र का स्थानीय स्तर पर कोई खास बजूद नही था क्योंकिं वे मुरैना के मूल निवासी है और उज्जैन में कारोबार करते हैं। उनकी अपने समाज मे छवि शिवराज विरोधी की है। उन्होंने किरार समाज के चुनाव में राष्ट्रीय अध्यक्ष के पद पर साधना सिंह को चुनोती दी थी इस बर्ष कोटा में। जाहिर है उन्हें भी बसपा केंडिडेट के रूप में इस समाज का समर्थन मिलता इसकी संभावना कम ही थी। इस वर्ग का वोट या तो बीजेपी को जाता या परम्परागत रूप से महल के नाते श्री सिंधिया को ही। इसके बाबजूद यह सो कोल्ड सर्जिकल स्ट्राइक क्यों कारित की गई है इसका जबाब श्री सिंधिया के बार रूम के कमांडर ही दे सकते है।

वैसे भी इस चुनाव में बीजेपी ने किसी फायरब्रांड को सिंधिया के सामने उतारा नही है किसी कैडरबेस को टिकट नही दिया। अभी तक पार्टी किसी अग्रेसिव केम्पेन को भी लांच नही कर पाई है। बाबजूद इसके श्री सिंधिया की रणनीति में इस सर्जीकल स्ट्राइक की आवश्यकता औऱ उपयोगिता समझ से परे है। उस स्थिति में जब श्री सिंधिया 2014 की तुलना में ज्यादा मेहनत कर रहे है यहां उनकी धर्मपत्नी श्रीमती प्रियदर्शिनी राजे 3 माह से प्रत्याशी की तर्ज पर खुद पूरे संसदीय क्षेत्र को नाप रही है। सिंधिया दम्पति पूरे लोकसभा को बुथबार खुद मॉनिटर कर रहे है। अब रही बात 5 लाख से जीत के सेल्फ प्रोजेक्शन की तो यह तभी संभव है जब कांग्रेस केंडिडेट के रूप में कुल मतदान का लगभग 80 फीसदी वोट प्राप्त हो। 

16 लाख मतदाता वाली गुना लोकसभा में औसतन 60 फीसदी वोट पड़ने के आसार है अनुमानित  यानी 9 लाख 60 हजार वोट में से श्री सिंधिया 7 लाख 60 हजार वोट हासिल करें। 2009 में 63.6 फीसदी वोट लेकर भी श्री सिंधिया 396244 वोट ले सके थे वहीं 2014 में 52.94 फीसदी के साथ वे 517036 वोट ला सके है। 2009 में श्री सिंधिया औऱ नरोत्तम मिश्रा के बीच 38 फीसदी का फासला था तब भी जीत का आंकड़ा ढाई लाख के पार नही हुआ था। इस चुनाव में यह आंकड़ा 38 फीसदी के ऊपर होगा फिलहाल जमीन पर नजर नही आता है। इस संसदीय सीट पर करीब 3 लाख वोटर शहरी आबोहवा वाला है और बीजेपी केंडिडेट की जाती का आंकड़ा भी 2 लाख के आसपास बताया जाता है मोदी फैक्टर को मिलाकर बीजेपी केंडिडेट के लिये मामला उतना भी बिगड़ा नही है जो कांग्रेस के 5 लाख के प्रोजेक्शन को जमीन पर उतार सके।असन्दिग्ध तौर पर श्री सिंधिया को फिलहाल यहां ऐज मिला हुआ है लेकिन बसपा केंडिडेट को बीजेपी पर सर्जीकल स्ट्राइक बताकर उचित निरूपित करना आंकड़ो औऱ यहां के वोटरों के मिजाज से बहुत प्रमाणिक नही कहा जा सकता है।

मायावती 4 मई को अशोकनगर में जनसभा करने वाली थी ऐसे में यह सीधे उनको नाराज करने वाली स्ट्राइक है शायद इसी लिये वे ज्यादा नाराजगी दिखा रही है और मप्र सरकार से अपने दो विधायकों का समर्थन वापिस लेने तक कि धमकी दे चुकी हैं। मायावती यहां तक कह चुकी है कि वे बिना केंडिडेट के ही सिम्बल पर गुना का चुनाव लड़ेंगी। अब यह कोन सी मारक सर्जीकल स्ट्राइक है जो श्री सिंधिया के कमांडर तय कर रहे है? आसानी से समझा जा सकता है। अच्छा होता बाररूम के सलाहकार या स्वयं श्री सिंधिया पिछले आंकड़ो पर भी नजर फेर लेते।