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जी हुजुर! नौकरशाह और भारत | EDITORIAL by Rakesh Dubey

04 March 2019

NEW DELHI: पता नहीं वो कौन सी नींद है जिसमें इस देश का ‘नौकरशाह' सोया हुआ है| शांति और भाईचारा ही नहीं, उन अन्य बदहालियों पर भी उससे सवाल है. शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य और तमाम वे सूचकांक देखिए जिनका संबंध सम्पूर्ण मानव विकास और नागरिक कल्याण से है| उसके प्रति भी ये नौकरशाह समाज उदासीन है. संविधान में वर्णित ये जिम्मेदारियां आखिर हैं तो इस नौकरशाह की ही , जिसे सर्वग्य माना जाता है | समाज कल्याण की अपेक्षा इनसे व्यर्थ दिखती है, इनमें यह भाव नदारद है.

सिविल सेवा अधिकारियों की गुणवत्ता की परख के लिए विश्व बैंक द्वारा जारी सूचकांक में भारत को 100 में से 45 अंक ही मिले हैं| जबकि 1996 में विश्व बैंक ने जब पहली बार इस तरह का सर्वेक्षण किया था तो ये दर 10 प्रतिशत अधिक थी | 1950-2015 की अवधि में आईएएस परीक्षा में सफलता की दर का आंकड़ा यूपीएससी ने खुद जारी किया है| इसके अनुसार 1950 में ये दर 11.5 थी| 1990 में ये 0.75 हुई हुई, 2010 में 0.26 प्रतिशत रह गई और 2015 में तो ये 0.18 प्रतिशत पर सिमट गई | 2016 में करीब चार लाख सत्तर हजार अभ्यर्थियों में से सिर्फ 180 IAS चुने गये| इससे कई सवाल उठते हैं| परीक्षा के बुनियादी ढांचे में गड़बड़ी है? सीटों की संख्या कम है? सवाल गुणवत्ता का भी है|

एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार इन चयनित अधिकारियों में यही पाया गया कि वे बस न्यूनतम शैक्षिक योग्यता को ही पूरा करते हैं यानी सिर्फ स्नातक हैं| उनमें से भी अधिकांश तीन चार कोशिशों के बाद सफल हुए हैं और कई ऐसे हैं जो दूसरे पेशों से आए हैं और उनकी उम्र अधिकतम है| दूसरी ओर कॉरपोरेट जगत के पैकेज और काम की बेहतर परिस्थितियों की वजह से प्रतिभाशाली युवाओं को प्रशासनिक सेवाओं की ओर आकर्षित करना कठिन चुनौती है| अफसरों की ट्रेनिंग का भी सवाल है. मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री आईएएस अकादमी अपनी संरचना में जितनी भव्य दिखती है, उतनी ही औपनिवेशिक भी| बेशक यहां राष्ट्रपति, राजनीतिज्ञ, कूटनीतिज्ञ और विशेषज्ञ आदि व्याख्यान देने आते हैं लेकिन लगता है, प्रशिक्षु अफसरों की ट्रेनिंग का मूल मंत्र "जी मंत्रीजी” की बाबू मानसिकता और यथास्थिति को बनाए रखना है|

इसके विपरीत संविधान इन्हें नागरिक अधिकारों की हिफाजत, जनसेवा और लोकतंत्र की निरंतरता को कायम रखने का प्रशासनिक दायित्व सौंपता है| लेकिन वास्तविकता में ये नागरिक समाज से अलग और जनता के सवालों, संघर्षों और आकांक्षाओं से दूर रहते हैं और इनका वक्त राजसत्ता को उपकृत करने और उपकृत रहने में ही बीतता है| 2010 के एक सर्वे के मुताबिक सिर्फ 24 प्रतिशत अधिकारी मानते हैं कि अपनी पसंद की जगहों पर पोस्टिंग, मेरिट के आधार पर होती है| हर दूसरे अधिकारी का मानना है कि राजनैतिक हस्तक्षेप एक प्रमुख समस्या है| प्रमोशन, तबादले, पोस्टिंग आदि भी नियमों को ठेंगा दिखाकर नेता-मंत्री-अफसर के गठजोड़ की दया पर निर्भर हैं| इस गठजोड़ में अब कॉरपोरेट-ठेकेदार-दलाल भी शामिल हो गये हैं|

राजनीतिक संपर्कों के आधार पर अधिकारियों को मलाईदार ओहदे दिये जाते हैं और रिटायरमेंट के बाद किसी निगम या आयोग की अध्यक्षता-सदस्यता देकर उनका पुनर्वास भी कर दिया जाता है| इस व्यवस्था में जो अफसर स्वतंत्र ढंग से काम करना चाहता है तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाता है| ऐसा नहीं है कि प्रशासनिक सुधारों की कोशिश नहीं की ग इसके लिये 1966 में पहला प्रशासनिक सुधार आयोग बनाया गया था| इसी आयोग ने पहले पहल लोकपाल के गठन की सिफारिश की थी| लेकिन सुधारों को लेकर कितनी गंभीरता है इसका अंदाजा इसी बात से लगता है कि दूसरा सुधार आयोग 2005 में जाकर बना| वीरप्पा मोइली इसके अध्यक्ष थे| लेकिन इसकी सिफारिशें लागू करने का दम किसी सरकार ने नहीं दिखाया. न खाऊंगा न खाने दूंगा वाली ललकार भी इस मामले पर दुबकी हुई सी दिखती है| आगे राम जाने देश का क्या होगा ?
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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