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सम्पत्ति बढ़ाने के खेल में जुटे नेताओं पर कार्रवाई हो | EDITORIAL by Rakesh Dubey

16 March 2019

लोक सभा चुनाव में नामांकन के साथ सम्पत्ति वृद्धि के आंकड़े सामने आने लगेगे | ये आंकड़े बाजार और देश के सामन्य वृद्धि आंकड़ों से कई गुना ज्यादा होते हैं | २४ घंटे राजनीति करने वालों की सम्पत्ति कैसे कई गुना बढती है. एक यक्ष प्रश्न है |संवैधानिक आदर्शों के अनुसार भले ही जन-प्रतिनिधि लोकसेवक होते हैं, पर यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि सांसद, विधायक या मंत्री बनकर कई नेता अपनी संपत्ति बढ़ाने में सफल रहते हैं| 

चुनाव के मौकों पर ही अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि कई सांसदों और विधायकों की संपत्ति में भारी बढ़ोतरी हो गयी| ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सरकार से इस संबंध में निगरानी का कोई इंतजाम नहीं होने के बारे में सवाल पूछना एक कर्तव्य बनता है |

२०१८ फरवरी में देश की सबसे बड़ी अदालत ने टिप्पणी की थी कि जनता द्वारा निर्वाचित विधायिका के सदस्यों द्वारा बेतहाशा संपत्ति जमा करना लोकतंत्र के असफल होने का सूचक है और अगर इस पर ध्यान नहीं दिया गया, तो हमारा लोकतंत्र तबाह हो जायेगा और माफिया शासन के लिए रास्ता खुल जायेगा| इसके साथ उसने निर्वाचित नेताओं की कमाई पर निगरानी के लिए ठोस व्यवस्था करने का निर्देश दिया था|साल भर बीतने के बाद भी इस दिशा में सरकार की ओर से कोई पहल नहीं की गयी है| इसी कारण अदालत को अब सफाई मांगनी पड़ी है| चुनाव में नामांकन के समय संपत्ति का आधा-अधूरा ब्योरा देना भी परिपाटी-सी बन गयी है| इस मसले पर भी सरकारी रवैये के बारे में अब जवाब-तलब किया गया है|

चुनाव समेत विभिन्न राजनीतिक गतिविधियों में धन और बल का इस्तेमाल तथा इस अवैध खर्च की भरपाई के लिए विधायिका और कार्यपालिका में मिले पद का दुरुपयोग ऐसी चुनौतियां हैं कि इनसे छुटकारा पाये बिना स्वस्थ लोकतंत्र की अपेक्षा नहीं की जा सकती है| पिछले साल के फैसले में अदालत ने इस बात पर भी चिंता जाहिर की थी कि इतने अहम मसले पर भी संसद और चुनाव आयोग का कोई ध्यान नहीं है|

देश की बड़ी आबादी गरीबी में और कम आमदनी में गुजारा करती है|सामाजिक और आर्थिक विषमता को पाटने तथा सर्वांगीण विकास की आशा को पूरा करने के लिए प्रयास करने एवं नेतृत्व देने का उत्तरदायित्व विधायिका और कार्यपालिका को है|इनके स्तर पर ही राजनीतिक भ्रष्टाचार की अनदेखी होगी, तो फिर और उपाय क्या रह जायेगा? संवैधानिक संस्था होने के बावजूद चुनाव आयोग के पास समुचित अधिकार नहीं हैं|आयोग को शक्तिशाली बनाने और चुनाव सुधार के कानून बनाने के विधि आयोग के अनेक सुझाव लंबे समय से सरकार के पास लंबित हैं| मतदाता अपने अधिकार का प्रयोग ठीक से कर सके, इसके लिए यह आवश्यक है कि उसके पास प्रत्याशियों के बारे में सभी प्रासंगिक सूचनाएं हों| समुचित पारदर्शिता के बिना भ्रष्ट और अपराधी चुने जाने की सम्भावना ही नहीं हैं, बल्कि चुने जाते रहे हैं| 

इसमें समस्या यह भी है कि किसी तथ्य को छुपाने या जन-प्रतिनिधित्व कानून का उल्लंघन करने का कोई मामला सामने आता है, तो आयोग, विधायिका और न्यायालयों को उसके निपटारे में बहुत समय लग जाता है| इस पर भी सोचा जाना चाहिए| इस बार तथ्यों को छिपाने वालों का बहिष्कार भी मतदाता को करना चाहिए | “नोटा” का सहारा भी लिया जा सकता है |
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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