सरकार खुश, महंगाई कम होगी | EDITORIAL by Rakesh Dubey

06 December 2018

बड़ी खबर यह है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने उम्मीद जताई है कि खुदरा महंगाई अगले एक वर्ष तक ४  प्रतिशत के विधिक रूप से वांछित स्तर से कम रहेगी। परिणामस्वरूप आरबीआई ने वर्ष की दूसरी छमाही के लिए मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान में भारी कटौती की है। उसने इसे  ३.९ से ४.५ प्रतिशत के स्तर से घटाकर २.७ से ३.२ प्रतिशत कर दिया है। चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही की बात करें तो इस अवधि में मुद्रास्फीति के अनुमान को ४.८ प्रतिशत से संशोधित करके ३.८ प्रतिशत से ४.२ प्रतिशत किया गया।

आरबीआई खुदरा महंगाई में आई नाटकीय कमी को लेकर चकित नजर आया। अक्टूबर में पेश की गई नीति में जताए गए अनुमान से यह काफी कम रही है। आरबीआई ने नवंबर तक के तीन महीने के दायरे में मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान को लेकर स्वयं जो सर्वे किया था, उसने भी अंतिम दौर में यही दिखाया कि उसमे ४०  आधार अंकों की कमी आई है। खुदरा महंगाई में आगे और गिरावट आने की उम्मीद है। उदाहरण के लिए नवंबर के आंकड़े बताते हैं कि यह ३  प्रतिशत के स्तर पर रह सकती है। काफी हद तक देखा जाए तो खुदरा महंगाई में यह गिरावट खाद्य वस्तुओं मसलन दाल, सब्जियों और चीनी आदि की कीमतों में आई अप्रत्याशित गिरावट की वजह से है।

अर्थ शास्त्र की भाषा में मुद्रास्फीति का यह दायरा काफी अच्छा माना जाता है और सरकार को इससे प्रसन्न होना चाहिए तथा आरबीआई को भी कम से कम ब्याज दरों में कटौती करनी चाहिए या इसका संकेत देना चाहिए। आरबीआई ने एक के बाद एक अपनी नीतिगत समीक्षा में केवल खुदरा महंगाई और महंगाई के अनुमान को ही निशाना बनाए रखा है। हालिया गिरावट के बावजूद आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति मोटे तौर पर इस बात को लेकर एकमत थी कि न तो रीपो दर में कटौती की जाए और न ही अपना रुख बदलकर वापस 'तटस्थ' किया जाए।  खुदरा महंगाई के घटकों को अलग-अलग करके देखा जाए तो पता चलता है कि आखिर क्यों आरबीआई ने इस तरह सतर्कता बरती होगी। 

हालांकि शीर्ष खुदरा महंगाई जिसका आकलन उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर सालाना आधार पर किया जाता है, उसमें  खाद्य और ईंधन कीमतों में गिरावट के कारण काफी धीमापन आया है लेकिन गैर खाद्य, गैर ईंधन क्षेत्र की खुदरा महंगाई में काफी इजाफा हुआ है। इतना ही नहीं आरबीआई न्यूनतम समर्थन मूल्य के आगे पडऩे वाले प्रभाव, संभावित राजकोषीय फिसलन और तेल विपणन से जुड़े देशों द्वारा उत्पादन कम करने पर तेल कीमतों में अचानक उछाल की आशंका से भी चिंतित है। ऐसे में आरबीआई चाहता है कि वह ठहरकर यह तय कर ले कि मुद्रास्फीति में गिरावट की प्रकृति ठोस है। परंतु मुद्रास्फीति में अचानक तेज उछाल के अलावा शायद पूरा ध्यान आर्थिक वृद्घि की संभावनाओं पर ही केंद्रित रहेगा। 

हालांकि वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े आरबीआई के अनुमान से कम रहे लेकिन केंद्रीय बैंक पूरे वित्त वर्ष के दौरान ७.४ प्रतिशत  की जीडीपी वृद्घि के अनुमान पर टिका हुआ है। विकसित दुनिया के अधिकांश देशों में भी आर्थिक वृद्घि पर बुरा असर हुआ है। अमेरिका और यूरो क्षेत्र दोनों में धीमापन आया है। जापान की हालत भी अलग नहीं है। इतना ही नहीं चीन और रूस जैसे कई उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों में भी धीमापन आया है। वैश्विक वित्तीय प्रवाह में आई अस्थिरता ने संभावनाओं को और धूमिल किया है। इसके बावजूद आरबीआई घरेलू अर्थव्यवस्था को लेकर निश्चिंत दिखा और उसने विनिर्माण क्षेत्र में और अधिक क्षमता के इस्तेमाल की बात कही। उसने यह भी कहा कि आगे चलकर ऋण की मांग में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कमजोर कीमत के कारण खपत में सुधार हो सकता है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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