नोट बंदी के मुद्दे को कौन जिन्दा रखे है ? | EDITORIAL by Rakesh Dubey

नोटबंदी के दो साल पूरे हो चुके हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव कुछ महीने बाद ही होने हैं, भाजपा विरोधी पार्टियां मोदी सरकार के इस सबसे बड़े नीतिगत फैसले की विफलता को एक बार फिर रेखांकित करने लगी हैं। हालांकि वित्तमंत्री बार बार इसे सफल बता रहे हैं और इसकी सफलता को नये पैमाने पर दिखाने की कोशिश करते हैं। इसके विपरीत इस फैसले की विफलता स्वत: स्पष्ट है।

8 नवंबर 2016 को नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी की घोषणा करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा था कि 500 और 1000 रुपये के नोट कागज की रद्दी में बदल गये हैं, लेकिन वे नोट कागज की रद्दी में नहीं बदले बल्कि लगभग सभी पुराने नोट नये नोटों में तब्दील हो गए। वैसे घोषणा पाकिस्तान के आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक की चर्चा की पृष्ठभूमि में की गई थी और उसे काले धन पर सर्जिकल स्ट्राइक बताया गया था , लेकिन काले धन का उससे कुछ भी नहीं बिगड़ा। उन नोटों के रूप में जमा किया गया काला धन बैंकिंग सिस्टम से होता हुआ सफेद हो गया। भारतीय रिजर्व बैंक ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उनसे स्पष्ट हो गया है कि वे सारे नोट बैंको में जमा हो चुके हैं ।

नोटबंदी की उस घोषणा से ३  लाख करोड़ रुपये का काला धन समाप्त हो जाने का अनुमान था । तब कहा  गया था कि कुल काला धन २५  लाख करोड़ रुपये का है, जिनमें से अधिकांशत: रियल इस्टेट के रूप में जमा है और उसके बाद सबसे ज्यादा काला धन सोने, हीरे व अन्य जेवरातों के रूप में जमा है| परिणाम यह निकला कि बड़े करंसी नोटों में जमा ३  लाख करोड़ रुपये के काला धन का भी कुछ नहीं बिगड़ा। जब सरकार को विफलता साफ दिखाई दे रही थी, तो उसने कुछ प्रलोभन भी दिए, ताकि सजा और पूर्ण जब्ती से बचने के लिए काले धन के मालिक अपने काले धन को घोषित कर दें, लेकिन उन प्रलोभनों का भी कोई लाभ नहीं हुआ और नोटबंदी के कारण जो कैश का संकट खड़ा हुआ, वह भारत के इतिहास मे ही नहीं, बल्कि शायद विश्व इतिहास की अभूतपूर्व घटना थी।



नकली नोटों की समाप्ति और आतंकवाद पर लगाम लगाना भी उसके उद्देश्यों में शामिल था, लेकिन नये नोटों की नकल भी शुरू हो गयी और वह समस्या जहां की तहां है। तब दावा किया जा रहा था कि पुराने नोटों के बंद होने के कारण आतंकवाद की कमर टूटेगी, क्योंकि यह मान लिया गया था कि नकली नोटों के बल पर वहां पाकिस्तान आतंकवाद को प्रश्रय दे रहा है। जब नोटबंदी प्रधानमंत्री द्वारा घोषित उद्देश्यों को पाने में विफ ल होने लगी, तो एकाएक उसका एक नया उद्देश्य डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा देना हो गया।कैश की तंगी के दौर में डिजिटल पेमेंट बढ़ा भी, लेकिन जैसे जैसे कैश की आपूर्ति बढ़ती गई, डिजिटल पेमेंट घटता गया। हां, इसका एक असर यह हुआ कि कुछ लोगों को डिजिटल पेमेंट की जानकारी हो गई। आज की सच्चाई यह है कि ८  नवंबर २०१६  को भारत में कैश का जो स्तर था, आज का कैश स्तर उससे कहीं ज्यादा ऊंचा है।

अब सरकार आयकर और आयकर दाताओं में हुई बढ़ोतरी को नोटबंदी की सफलता बता रही है। यह इसका घोषित लक्ष्य नहीं था, लेकिन यदि इस मोर्चे पर सफलता प्राप्त हो रही है, तो यह अच्छी बात है। वित्तमंत्री जो आंकड़े पेश कर रहे हैं, उनसे तो यही लगता है कि वे सच कह रहे हैं। अब ज्यादा लोग आयकर देने लगे हैं। आयकर रिटर्न दाखिल करने वालों की संख्या भी बढ़ गई है और आयकर की प्राप्त राशि भी पहले से ज्यादा है।

नोटबंदी कितनी विफल रही और कितनी सफल रही, अब यह शोध का विषय बन गया है, इसे राजनैतिक मुद्दा बनाने से कौन क्या हासिल करेगा और कौन क्या खोएगा। इसके कारण जिन करोड़ों लोगों को नुकसान हुआ था, वे इसे एक बुरा हादसा समझकर भूल जाना चाहते हैं। राजनीति इसे जिन्दा रखे हैं, और शायद २०१९ के लोकसभा चुनाव तक जिन्दा रहेगा। 
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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