DRIVING LICENCES के नाम पर INSURANCE क्लेम खारिज नहीं कर सकती कंपनी | उपभोक्ता फोरम

10 November 2018

पानीपत। इंश्योरेंस कंपनियां बीमा क्लेम को खारिज करने का कोई ना कोई तरीका ढूंढ ही लेतीं हैं परंतु उपभोक्ता फोरम के प्रधान डीएन अरोड़ा ने एक मामले में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि गलत ड्राइविंग लाइसेंस बना है तो इसके लिए परिवहन विभाग जिम्मेदार है, उपभोक्ता की गलती नहीं है, अत: उसे बीमा क्लेम से इंकार नहीं किया जा सकता। ऐसे हालात में मोटर व्हीकल एक्ट का सेक्शन 4 प्रभावी नहीं होता।

यह है पूरा मामला 
दरअसल रेलवे कालोनी अंबाला कैंट में रहने वाले राजेंद्र पांडे ने ट्रक का 6 मई 2016 को बीमा करवाया। इसकी अवधि 5 मई 2017 तक थी। 7 मार्च 2017 को उसके ट्रक का उस समय हादसा हो गया, जब ट्रक को उसका बेटा गोपाल पांडे चला रहा था। हादसा लुधियाना में साहनेवाल पुलिस स्टेशन एरिया में हुआ। गोपाल ने बिना गीयर के वाहनों का लाइसेंस 29 दिसंबर 2012 में बनवाया था, जिसकी वैधता 21 मार्च 2022 तक थी। बाद में उसने 5 मई 2015 को हैवी व्हीकल लाइसेंस बनवा लिया, जिसकी वैधता 21 मार्च 2020 तक थी। 

बतौर राजेंद्र उसे हादसे के चलते 4 लाख 9 हजार 129 रुपये का नुकसान हुआ। अधिकृत डीलर से उसने इसे 9 जुलाई 2017 को ठीक कराया। इतना ही नहीं, उसने इसकी रसीद 1026 भी बीमा कंपनी को दे दी। बीमा कंपनी ने मौके पर जाकर मुआयना किया और अपनी रिपोर्ट भी कंपनी को सौंप दी लेकिन कंपनी ने क्लेम देने से इंकार कर दिया। लीगल नोटिस के बाद भी कोई सुनवाई नहीं की। 

इसके बाद उपभोक्ता फोरम में राजेंद्र पांडे ने 25 जनवरी 2018 को केस प्रस्तुत। बीमा कंपनी ने फोरम को बताया कि पांडे का जन्म दिनांक 26 जनवरी 1995 है और उसने 29 दिसंबर 2012 में जब लाइसेंस बनवाया तो उसकी उम्र 17 साल 11 महीने थी। इसीलिए वह क्लेम का हकदार नहीं बनता। क्योंकि उसने गलत तरीके से लाइसेंस बनवाया है।

फोरम ने यह दिया तर्क 
उपभोक्ता फोरम ने दोनों पक्षों को सुनकर 5 नवंबर को अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि जिस दिन हादसा हुआ तो गोपाल की उम्र 21 साल थी। ऐसे में मोटर व्हीकल एक्ट का सेक्शन चार यहां लागू नहीं होगा। दूसरा गलत तरीके से लाइसेंस बनवाने में मेनपुर के प्रशासन की लापरवाही बनती है। इसमें उपभोक्ता की कोई गलती नहीं है। इसके अलावा बीमा कंपनी ने 1954 के एक्ट का हवाला भी अपनी अपील में किया था। लेकिन इसे भी फोरम ने अस्वीकार करते हुए 3 लाख 7 हजार रुपये नौ प्रतिशत के ब्याज सहित देने के आदेश दिए साथ ही 5 हजार रुपये कोर्ट खर्च के देने के आदेश भी कंपनी को दिए। क्योंकि सर्वेयर ने इतनी ही राशि अपनी रिपोर्ट में मान्य बताई थी।
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