महिला आत्महत्या: देश का सिर झुकता हैं | EDITORIAL by Rakesh Dubey

17 September 2018

कितनी लज्जा की बात है विश्व में आत्म हत्या करने वाली महिलाओं में से एक  तिहाई से अधिक महिलाएं भारतीय होती हैं | महिलाओं की खुदकुशी पर आई  लैंसेट पब्लिक हेल्थ  जर्नल की रिपोर्ट खास तौर पर भारत के लिए चिंता पैदा करने वाली है। इसके मुताबिक पूरी दुनिया में आत्महत्या करने वाली 1000  महिलाओं में 366  भारतीय होती हैं। हालांकि आंकड़ों के मुताबिक, 1990 से लेकर 2016 के बीच भारत में आत्महत्या करने वाली महिलाओं की तादाद घटी है, बावजूद इसके, वैश्विक स्तर पर महिला खुदकुशी के आंकड़ों में हमारा योगदान अप्रत्याशित रूप से बढ़ा है। यह वैश्विक परिदृश्य में हमारी साख पर प्रश्न चिन्ह है |

हमें यह स्वीकारने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि दुनिया ने इस समस्या को सुलझाने में जितनी तेजी दिखाई है, उसके मुकाबले हम फिसड्डी रहे हैं। लिंग भेद की प्रताड़ना  के कारण इन आत्महत्याओं की संख्या में वृद्धि की बात कही जाती है। यह समस्या का सिर्फ एक पहलू है। शिक्षा और कामकाजी महिलाओं ने भी कई बार आत्महत्या की राह पकड़ी है। अगर अपने देश भारत में इसकी प्रकृति को समझने की कोशिश करें तो इसकी गंभीरता के साथ-साथ जटिलता का भी अहसास होता है। देश में आत्महत्या का रास्ता पकड़ने वाली महिलाओं में 71.2 प्रतिशत हिस्सा 15 से 39 साल के आयु वर्ग का होता है। रिपोर्ट इस तथ्य को खास तौर पर रेखांकित करती है कि खुदकुशी करने वाली महिलाओं में ज्यादातर शादीशुदा होती हैं। ये आंकड़े  जिस अध्ययन अवधि के उसके अनुसार अन्य कालवधि पर विचार करने पर समस्या की भयावहता का अंदाज होता है। 1990 से 2016 के बीच की जो अवधि अध्ययन के लिए चुनी गई है, भारत में उस दौरान लड़कियां न केवल शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ीं बल्कि स्त्री-पुरुष संबंधों के ढांचे में भी अहम बदलाव देखने को मिले। ऐसे बदलाव ने कुछ और नये मापदंड जरुर बनाये पर समस्या निवारण उनकी भूमिका कोई ज्यादा बेहतर नही दिखी।

बड़े शहरों में लिव-इन जैसे रिश्ते आम होते गए, तो छोटे शहरों में भी रिश्तों का खुलापन आया। परिवार के अंदर घुटन भरे माहौल से लड़कियां बाहर जरुर  निकलीं, लेकिन आगे जॉब और रिलेशनशिप की जटिलताओं से उपजे अलग तरह के तनाव उनका इंतजार कर रहे थे। भारतीय महिलाओं के लिए यह बिल्कुल नए तरह का तनाव है, सो इससे उबरने और इसके लिए अभ्यस्त होने में एक लम्बी अवधि के साथ मानसिकता बदलने का धैर्य की आवश्यकता भी है। इस कठिन मोर्चे पर महिलाओं को अकेले जूझने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता यह सम्पूर्ण समज का दायित्व है इन परिस्थितियों पर चिन्तन करे। अन्य देशों का अनुभव बताता है कि जरा सी मदद और सही समय पर थोड़ी सी हिम्मत ने इस आधी आबादी की मुश्किल को आसान किया है। जब दुनिया में इससे बदलाव दिखता तो भारत इस जरा सी मदद का इंतजार क्यों ? सरकार और समाज को  बहुत कुछ करना है, फौरन करना चाहिए।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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