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मप्र राज्य स्कूल शिक्षा सेवा के कर्मचारी शासकीय सेवक होंगे या नहीं | MP ADHYAPAK NEWS

06 August 2018

सम्मानित अध्यापक साथियो, मप्र राज्य स्कूल शिक्षा सेवा (भर्ती एवं पदोन्नति) नियम 2018 के गुण दोष के विषय मे बहुत कुछ लिखा जा रहा है। पक्ष विपक्ष में जारी बहस के बीच स्थापित नियम प्रक्रियाओं की कसौटी पर इस राजपत्र को परखने की ओर ज्यादा ध्यान नही दिया जा रहा है जबकि यह सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। प्रकाशित राजपत्र में पूर्व में जारी मन्त्रिमण्डल संक्षेपिका से हटकर कुछ नया नही है केवल नियम 14 के उपनियम 7 में पदोन्नति एवं क्रमोन्नति हेतु सेवा अवधि की गणना करने हेतु शासन ने गेंद अपने पाले में रखी है, वह भी पूर्व में जारी कतिपय निर्देश अथवा भविष्य में जारी होने वाले इस बाबत निर्देश स्पष्ठ नही है। किसी भी संवर्ग की सेवा शर्ते कुछ बिंदुओं पर निर्भर करती है जिसके आधार पर कार्यरत कर्मचारी के लाभ या हानि का आकलन होता है। इसपर कुछ चर्चा करें

इस सेवा के कर्मचारी शासकीय सेवक होंगे या नहीं
1. इस सेवा के कर्मचारी शासकीय सेवक है या नहीं ? हम शासकीय सेवक ना होने का परिणाम भुगत रहे है यही हमारी मुख्य मांग रही है। यह राजपत्र नियमित शिक्षक, लिपिक, अधिकारियों हेतु जारी पूर्व के राजपत्रों जैसे फॉर्मेट में है। अवकाश, सेवानिवृति, अनुशासनात्मक अधिकारी, आचरण नियम का लागू होना आदि बातों का समावेश ना होना इस बात का संकेत है कि नवीन सेवा के कर्मचारी राज्य शासन के नियमित कर्मचारी होंगे। शासन को इसपर तत्काल स्पष्टीकरण देकर यह मुद्दा खत्म कर देना चाहिये।

एक उलझ हुआ बिंदु यह भी है 
2. पूर्व संवर्ग की सेवाओं का लाभ नवीन संवर्ग में देय आर्थिक व अन्य सुविधाओं के परिपेक्ष्य में प्राप्त करना भी एक उलझ हुआ बिंदु है। राज्य शासन के किसी एक विभाग से दूसरे विभाग के समान प्रकृति वाले पद पर नियुक्ति हेतु लोक सेवा नियम 1961 में प्रावधान स्पष्ट है। राजपत्र में इन नियमों पर प्रतिकुल प्रभाव डाले बगैर नियम बनाये जाने का उल्लेख है जो नियमानुसार है। उक्त लोक सेवा नियम 1961 पूर्व पद की निरन्तरता को समाप्त करके नवीन नियुक्ति प्रदान करते है। 
अतः शासन यदि पूर्व पद का वेटेज नवीन सेवा में ग्रेजुएटी, अवकाश, पेंशन, भविष्य में होने वाली विभागीय परीक्षाओं आदि में देना चाहे तो दे सकता है किन्तु इस हेतु उक्त नियमों में अपवाद स्वरूप एक बार छूट राजपत्र के ही माध्यम से शासन दे सकता है, पूर्व में ऐसा हो चुका है और पॉलिसी मेटर में राज्य निर्णय हेतु स्वतंत्र है।

सिर्फ शिक्षाकर्मी को वरिष्ठता मिल सकती है 
3. सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा पदोन्नति/क्रमोन्नति/वरिष्ठता हेतु नवीन संवर्ग में वरिष्ठता का है। पदोन्नति में वरिष्टता से चूंकि किसी अन्य संवर्ग की वरिष्ठता प्रभावित नही हो रही और अध्यापकों की परस्पर वरिष्ठता वही होंगी जो अध्यापक संवर्ग में है, अतः इसे नियुक्ति दिनांक से देने में शासन को कोई दिक्कत नही होगी। दूसरे क्रमोन्नति हेतु नियुक्ति दिनांक से वरिष्ठता देने में संविदा काल का पेंच फंस सकता है क्योकि शासन के अन्य विभागों के पूर्व संविदा कर्मचारी भी यह मांग उठा सकते है। इसीलिये 2007 में शिक्षाकर्मी को ही अध्यापक राजपत्र में क्रमोन्नति/पदोन्नति हेतु वरिष्ठता मिली थी संविदा को नही। संविदा को 2013 में कार्यकारी आदेश द्वारा नियुक्ति दिनांक से मिली किन्तु नियमो में भूतलक्षी प्रभाव से इस बाबत संशोधन होने थे वे आज तक नही हुये। शिक्षाकर्मी 1998 से नियमित पद पर भर्ती के फलस्वरूप नियुक्ति दिनांक से वरिष्ठता नियमानुसार शासन दे सकता है।

सचेत रहने की आवश्यकता है
4. सातवां वेतनमान में वेतन निर्धारण हेतु राजपत्र की अनुसूची (1) में देय छठवें वेतनमान हमारे लिये लाभदायी है। यह अटपटा लग सकता है किंतु मेरा यही आकलन है कि यदि उक्त अनुसूची में सीधे सातवें वेतनमान का उल्लेख होता तो सामान्य प्रशासन के अन्य विभागों में संविलियन हेतु पूर्व में जारी वेतन निर्धारण सम्बन्धी आदेशों निर्देशों से हमे दिक्कत हो सकती थी। सातवें वेतनमान का उल्लेख अनुसूची 1 के नीचे टीप में किया गया जो जुलाई 2018 से देय होंगा। इस सम्बंध में सचेत रहने की आवश्यकता है।

समर्थन या विरोध दोनों व्यवहार ठीक नही
आज कुछ लोग इस राजपत्र का अंधा समर्थन करके जो इसमे है ही नही उसकी ग्यारंटी देकर इसका स्वागत कर रहे है। वही दूसरी ओर कुछ लोग जो इसमे निहित है उसको भी अनदेखा करके अंधा विरोध कर रहे है। यह दोनों व्यवहार ठीक नही है। कमियों को ढूंढा जाये एवं शासन के संज्ञान में लाया जाये। जो संघ नियमित शिक्षक संवर्ग में संविलियन पर अड़े वो भी अपनी जगह सही है क्योकि 20 वर्षो से उनकी यही मांग रही थी, वे उसके लिए आवाज उठाएंगे ही। जिसको जो करना है उसे करने देवे। 

कोई भी संघ अध्यापक का अहित नही कर सकता
कोई भी संघ अध्यापक का अहित नही कर सकता क्योंकि उसकी इतनी हैसियत ही नही होती और ना ही कोई अपने दम पर दिलवा सकता है क्योकि शासन को जो देना होता वो वही देता है। माननीय मुख्यमंत्रीजी ने सर्व संघ के साथ दिसम्बर की बैठक में ही संविलियन पर सहमति दे दी थी। बाकी जो इन सात महीनों में हुआ उसमे वह नाम चमकाने की जद्दोजहद ज्यादा थी। इस राजपत्र से अध्यापको के जीवन पर पड़ने वाले  सकारात्मक और नकारात्मक प्रभावो दोनों का श्रेय माननीय मुख्यमंत्रीजी को ही जायेगा।
रिजवान खान, अध्यापक, बैतूल



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