सेना में अफसरों की कमी भी एक मुद्दा है ! | EDITORIAL by Rakesh Dubey

04 August 2018

यह निश्चित ही गंभीर बात है कि सेना के पास पूरे अफसर नहीं हैं। अधिकृत  जानकारी के अनुसार रक्षा मंत्रालय के तमाम प्रयासों के बाद भी सेना के तीनों अंग अफसरों की कमी का सामना कर रहे हैं। वायुसेना और नौसेना के मुकाबले थलसेना में अफसरों के कहीं अधिक पद रिक्त हैं। यह सामान्य बात नहीं कि रक्षा मंत्रालय बार-बार यह विवरण देकर कर्तव्य की इतिश्री कर ले कि सेना के विभिन्न् अंगों में अफसरों के इतने-इतने पद खाली हैं।

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमन ने ही कुछ दिन पूर्व यह कहा था कि देश के तीनों सशस्त्र बल करीब ५२  हजार कर्मियों की कमी हैं। यह सही है कि रक्षा मंत्रालय ने सैन्य अफसरों और साथ ही सैनिकों की कमी दूर करने के प्रयास किए हैं, लेकिन समस्या बरकरार रहने से यह भी साफ है कि प्रयासों में कहीं कोई कमी रह गई। सैन्य अफसरों की कमी का एक कारण यह बताया जाता है कि बीते कुछ समय से सेना में अफसर बनकर देश की सेवा करने लायक युवा दूसरे क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं।

युवाओं के लिए ये दूसरे क्षेत्र आकर्षक इसलिए हुए हैं, क्योंकि उनमें वेतन के साथ सेवा शर्तें बेहतर हुई हैं। यह स्वाभाविक है कि जब सेना की जरूरत के लायक सक्षम युवा दूसरे क्षेत्रों को बेहतर पाएंगे तो वे उसी ओर उन्मुख होंगे। इस स्थिति को तभी बदला जा सकता है, जब सैन्य सेवाओं की सेवा शर्तें अन्य क्षेत्रों से बेहतर और युवाओं की रुचि के अनुरूप हों। आखिर ऐसा करने में क्या कठिनाई है? कम से कम इस काम में तो धन की कमी आड़े नहीं आने देनी चाहिए, क्योंकि देश की सुरक्षा सर्वोपरि है।

रक्षा मंत्रालय के नीति-नियंताओं को इससे अवगत होना चाहिए कि समय के साथ-साथ सामाजिक संरचना बदली है। एक समय किसी इलाके और साथ ही परिवार के लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी सैन्य सेवाओं में जाते थे। बदलते वक्त के साथ यह परंपरा शिथिल पड़ी है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि देश में ऐसे युवाओं की कमी है, जो सेना की कसौटी पर खरे उतर सकें। दरअसल जरूरत इसकी है कि रक्षा मंत्रालय का प्रचार तंत्र उन तक पहुंचे। इसी के साथ चयन प्रक्रिया में भी यथोचित परिवर्तन करने पर विचार किया जाना चाहिए।

इस तकनीकी युग में शारीरिक सामर्थ्य के साथ बुद्धिबल की महत्ता बढ़ गई है। भविष्य में युद्ध तकनीक की मदद से अधिक लड़े जाएंगे। यह बदलते वक्त की मांग है कि रक्षा मंत्रालय अपनी जरूरत की तलाश भिन्न् पृष्ठभूमि वाले युवाओं के बीच भी करे और इस क्रम में उन मानदंडों में यथासंभव बदलाव भी करे जो सेनाओं में भर्ती के लिए एक अरसे से प्रचलित हैं। इसी के साथ समाज की भी यह जिम्मेदारी है कि वह ऐसा वातावरण निर्मित करे, जिसमें हमारे युवा सैन्य अफसर बनकर देश सेवा करने के जज्बे से लैस बने रहें। कितनी  अजीब बात है कि युवाओं के देश की सेना संख्याबल की कमी का सामना करे। इसका मतलब है कि हम उचित शिक्षा-दीक्षा के अभाव में योग्य युवा नहीं तैयार कर पा रहे हैं और इस ओर किसी का  ध्यान भी नहीं जा रहा है।
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श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
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