सोशल मीडिया, पुलिसिया पहरेदारी और सुप्रीम कोर्ट | EDITORIAL by Rakesh Dubey

Saturday, July 14, 2018

सोशल मीडिया पर निगहबानी करने वाले साफ्टवेयर बनवाने के पहले सरकार से सुप्रीम कोर्ट न जवाब तलब किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्विटर फालोअर्स की संख्या धड़ाधड़ गिर रही है। पुलिस को दोहन का एक और हथकंडा मिल गया है। ट्विटर के उन एकाउंटों की सूची पुलिस के पास है, जिन्हें ट्व्टिर ने बंद कर किया है या बंद किया जाना है। ये एकाउंट उसके हिसाब से फर्जी हैं। व्हाट्सएप ने अपने नए अपडेट के साथ ऐसी व्यवस्था की है कि अब अगर कोई संदेश फॉरवर्ड होगा तो पता लग जाएगा कि यह मूल रूप से तैयार किया हुआ संदेश नहीं है, बल्कि इधर का माल उधर  है। इन सबका बड़ा नतीजा निकलेगा इसकी उम्मीद करना अभी बहुत जल्दी है। टिव्टर पर लोगों को धकियाने, गरियाने या बेज्जत किए जाने का सिलसिला अभी रुका नहीं है। व्हाट्सएप पर वे सिलसिले अभी भी चल रहे हैं, जो नफरत के किस्से गढ़ते हैं, लेकिन टिव्टर और व्हाट्सएप के पास कोई विकल्प नहीं था। सरकार की तरफ से भी दबाव था, इसलिए उन्हें कुछ करते हुए दिखना था, सो उन्होंने सूची तैयार कर  दी, सूची अब पुलिस के पास है। सुप्रीम कोर्ट ने ३ अगस्त तक सरकार से जवाब माँगा है और कहा है कि सरकार इस लांछन से बचे कि देश में हर किसी की निगरानी हो रही है।

ट्व्टिर, व्हाट्सएप, मोबाइल एप और वेबसाइट सोशल मीडिया कहलाते हैं। संवाद की नई शैली है। संवाद के बारे में हमारी धारणा यह है कि बात करने से नजदीकियां बढ़ती हैं और गलतफहमियां दूर होती हैं। इंटरनेट के सोशल मीडिया ने हमारी इस धारणा की सीमा भी बता दी है। जहां बात आमने-सामने न हो और छद्म नाम के पीछे छुपने की सुविधा  हो वहां संवाद गलतफहमियां  फैलाने में बहुत कुशल साबित होता है। ऐसे में हम तीसरे के बारे में गलतफहमी के शिकार हो सकते हैं और बाद में उसे सैकड़ों तक पहुंचा सकते हैं। इसी तरह अफवाह फैलाने  के बारे में सोचें तो वे कोई नई चीज नहीं हैं, वे जमाने में भी थीं जब कोई ऐसी तकनीक नहीं थी। तब भी उनकी वजह से दंगे होते थे और हुए हैं। इस इंटरनेट युग ने सोशल मीडिया संवाद का एक कुशल और तेज माध्यम दिया है, जिससे गलतफहमियां और अफवाहें बड़ी तेजी से बनती बिगड़ती और फैलती हैं। इसमें वे लोग भी बड़ी संख्या में हैं, जिनकी दुकान या राजनीति इसी नफरत से चलती थी, वे अब अपने काम को ज्यादा कुशलता से अंजाम दे लेते हैं और अभी दे रहे हैं। हमारी ये समस्याएं मूल रूप से या तो सामाजिक हैं या राजनीतिक, हमारी दिक्कत यह है कि हम इनका तकनीकी समाधान निकलना चाहते हैं,  जो शायद संभव नहीं है। तकनीक से कुछ चीजों को कुछ हद तक रोका जा सकता है, निगरानी के तंत्र विकसित किए जा सकते हैं उनके दुरुपयोग के खतरे  की आशंका के साथ। इन प्रवृत्तियों को पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।

इसका मतलब यह नहीं है कि हम पूरी तरह असहाय हैं, समस्या यह है कि हम समाधान तकनीक से मांग रहे हैं, समाज और राजनीति से नहीं मांग रहे है । हमारे वर्तमान सामाजिक विमर्श में न तो राजनीति पर विश्वास किया जाता है, न पुलिस पर, न न्यायपालिका पर, और परंपरागत मीडिया अविश्वास करना तो सोशल मीडिया का सबसे बड़ा फैशन है। ऐसे में जो लोग भड़कते हैं, वे वहीं और उसी क्षण फैसला सुना कर सजा दे देना चाहते हैं। यह एक फटाफट न्यायतंत्र है। फैसला सुनवाई से पहले हो जाता है। सजा के बाद उसका औचित्य प्रतिपादित होता है। सवाल यह है सोशल मीडिया के स्वभाव में यह अतिरेक क्यों है ?इसका उत्तर है हमारी प्रशासनिक लेटलतीफी कुछ वर्षों पहले तक हम न्यायिक सुधार, प्रशासनिक सुधार और पुलिस सुधार वगैरह की बाते करते थे, अब इनकी कहीं चर्चा भी नहीं होती। आज जो हर तरफ तनाव दिख रहे हैं, और कहने- सुनने का आसान तरीका सोशल मीडिया ही है। सरकार ने उसे पुलिस के हाथ में दिया है। इसमें अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है। जब तक भाव का प्रकटीकरण संविधान की सीमा में , द्वेष रहित , और राष्ट्र हित में हो, यथावत व्यवस्था रहे। सबको एक डंडे से हांकने का परिणाम देश के इतिहास में “आपातकाल” के रूप में दर्ज़ है। सरकार को सुप्रीम कोर्ट में वह जवाब देना चाहिए जिससे न्यायलय के साथ जनता भी संतुष्ट हो।
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