न्याय की जड़ों के बजाय पत्तों का सींचने की कवायद | EDITORIAL

Tuesday, May 1, 2018

राजेन्द्र बंधु। भारत सरकार द्वारा पोक्सो कानून में संशोधन कर 12 वर्ष तक की बच्ची से दुष्कर्म पर मृत्यूदण्ड की सजा के प्रावधान पारित किया गया। इससे पहले मध्यप्रदेश और राजस्थान यह संशोधन कर चुके हैं और अब केन्द्र सरकार के इस संशोधन के बाद यह पूरे देश में लागू हो चुका है। यह सही भी है कि दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के लिए कड़ी से कड़ी सजा होनी चाहिए और समाज में ऐसे अपराधियों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। यह माना जा रहा है कि इस संशोधन के बाद बच्चियों से दुष्कर्म जैसे अपराधों में कमी आएगी। लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा। इस पर अब तक के अनुभवों के मद्देनजर विचार करने की जरूरत हैं।

इस संशोधन के परिप्रेक्ष्य में यदि हम विशुद्ध रूप से कानून और न्याय की परीधि में विचार करें तो यह बात स्पष्ट होती है कि दुष्कर्म सहित किसी भी अपराध में आरोपी का सजा से बच जाना अपराध को बढ़ावा देता है। यानी हमारी पूरी कोशिश होनी चाहिए कि न्यायालय में आरोपी को दोषसिद्ध किया जाए और वहां उसे उस कानून की अधिकतम सजा दिलवाए। क्या पोक्सो कानून के इस संशोधन से हम न्यायालय में आरोपी की दोषसिद्धि सुनिश्चित कर पाएंगे? इस संदर्भ में इसमें कुछ न्यायिक घटनाओं, तथ्यों और पुलिस की भूमिका पर विचार करने की जरूरत हैं। यदि इतने बड़े संशोधन के बाद भी यदि आरोपी की सजा सुनिश्चित नहीं कर पाएं तो यह संशोधन न्याय व्यवस्था की जड़ के बजाय पत्तों को सींचने की तरह होगा।  

दिसम्बर 2012 में निर्भया घटना के बाद भारत सरकार द्वारा दण्ड विधि  में संशोधन कर दुष्कर्म सहित महिलाओं पर होने वाले अन्य अपराधों के लिए कठौर दण्ड का प्रावधान किया गया। इसके बावजूद राष्ट्रीय अपराध अनुंसधान ब्यूरों की 2016  की रिपोर्ट के अनुसार देश में दुष्कर्म के 34651 मामले दर्ज किए गए। यानी देश में हर घंटे दुष्कर्म के कहीं न कहीं चार मामले दर्ज होते है। यानी इतने कठोर कानून के बावजूद दुष्कर्म की घटनाओं में कमी देखने को नहीं मिली। इस संदर्भ में एक सचाई यह भी है कि वर्ष 2015 में दुष्कर्म के मामलों में सिर्फ 29 प्रतिशत आरोपियों का ही सजा मिल पाई है। यानी 71 प्रतिशत आरोपी दोषमुक्तम हो जाते है। क्या हम यह मान सकते हैं कि इतनी बड़ी संख्या में आरोपी इसलिए दोषसिद्ध नहीं हो पा रहे हैं, क्योंकि दुष्कर्म नहीं हुआॽ यदि हम ऐसा सोचते हैं तो यह हमारी एक बड़ी भूल होगी। दरअसल हमारा पुलिस तंत्र और अनुसंधानकर्ता अधिकारी इस तरह से काम ही नहीं करते कि वह आरोपियों को दोषसिद्ध कर सकें।

दुष्कर्म सहित अन्य अपराधों को रोकने के लिए सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि क्या महिलाओं पर होने वाले हर अपराध की एफआईआर पुलिस द्वारा लिखी जा रही हैॽ यदि किसी घटना की पुलिस द्वारा एफआईआर ही नहीं लिखी गई तो वह अपराधी फिर से अपराध करने के लिए प्रेरित होगा। दुष्कर्म जैसे अपराध के होने और उसे बढ़ावा मिलने की मूल समस्या पुलिस का रवैया ही है। किन्तु सरकारें राजनैतिक कारणों से पुलिस के इस खामी को छिपाकर कानून को कठोर बनाने ढोंग रचती है, जिससे दुष्कर्म सहित अन्य अपराधो की घटनाएं रोक पाना मुश्किल होता है।

इतिहास में ऐसी कई घटनाएं दर्ज है जब पुलिस ने दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध की एफआईआर लिखने से इंकार कर दिया। कई पीड़िताओं की शिकायत तो कई दिनों के इंतजार के बाद लिखी गई। भोपाल की घटना ज्यादा पुरानी नहीं है, जहां सामुहिक दुष्कर्म की पीड़िता को एफआईआर लिखवाने के लिए एक थाने से दूसरे थाने तक भटकना पड़ा है। हालांकि अब इसमें न्यायालय आरोपियों का दण्ड सुना चुका है, किन्तु प्रदेश के मुख्यमंत्री की उस घोषणा का पालन अब तक नहीं हुआ, जिसमें एफआईआर नहीं लिखने वाले पुलिस अधिकारियों पर आईपीसी की धारा 166 बी के तहत केस दर्ज करने की बात कही गई थी। सन् 2015 में कॉमनराईट्स ह्यूमन इनीशिएटिव्य द्वारा दिल्ली और मुंबई में किए गए सर्वेक्षण से यह तथ्य सामने आया है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध के 25 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दर्ज होती है। यानी 75 प्रतिशत आरोपी बेखौफ घुमते हैं और फिर से अपराध के लिए प्रोत्साहित होते हैं। रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली में दुष्कर्म से 13 मामलों में से सिर्फ एक की ही एफआईआर होती है।   
इन सब तथ्यों से यह समझा जा सकता है कि महिलाओं पर अपराध की असली जड़ें कहां हैं? पुलिस द्वारा एफआईआर नहीं लिखने के कारण जब अपराधी खुला घूमता रहे और पीड़ित को न्याय की परीधि से ही बाहर रखा जाए तो किसी भी कानून की कोई भी कड़ी सजा का मायने नहीं रखती। 

यह स्पष्ट है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 166ए के अंतर्गत एफआईआर नहीं लिखने पर संबंधित पुलिस अधिकारी को जेल की सजा का प्रावधान है। जबकि ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं है, जब पुलिस द्वारा एफआईआर नहीं लिखी गई। इसके बावजूद एक भी पुलिस अधिकारी पर केस दर्ज नहीं होना सरकार की नियत को दर्शाता है। 

हाल ही में नाबालिक के साथ दुष्कर्म को फांसी की सजा दिए जाने का कानून पारित करने वाली सरकार यदि पुलिस अधिकारियों को उत्तरदायी बनाने के लिए भी कोई कठोर कानून पारित करती तो यह ज्यादा उपयोगी होगा। ऐसा लगता है कि सरकार सिर्फ बड़े कानून बनाकर सिर्फ प्रचार—प्रसार करना और खोखली वाहवाही बटोरना चाहती है। यदि सरकार महिलाओं एवं बच्चों पर  अपराध रोकने के मामले में गंभीर है तो सबसे पहले उसे उन पुलिस अधिकारियों पर भी तुरन्त प्रकरण कायम करना चाहिए जो एफआईआर न लिखकर अपराधियों के बचाने में अपनी भूमिका निभाते हैं।
राजेन्द्र बंधु
हाईकोर्ट एडव्होकेट
इन्दौर, मध्यप्रदेश 452001
ईमेल : rajendrabandhu@gmail.com 

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