RERA: रजिस्ट्री के बाद शिकायत की तो बस वक्त बर्बाद होगा | RERA RULES

Friday, February 16, 2018

भोपाल। REAL ESTATE REGULATORY AUTHORITY केवल एग्रीमेंट से लेकर रजिस्ट्री होने तक उपभोक्ताओं के हितों (CONSUMER INTEREST) की रक्षा करती है। इसके बाद यदि कोई विवाद (DISPUTE) होता है तो रेरा कुछ नहीं कर सकता लेकिन अजीब बात यह है कि रेरा REGISTRY के बाद होने वाले विवादों को सुनवाई के लिए COMPLAINT स्वीकार कर लेता है। कुल मिलाकर यदि रजिस्ट्री के बाद आपने रेरा में BUILDER की शिकायत की तो रेरा आपके हितों की रक्षा नहीं करेगा, उल्टा उसकी शिकायत और सुनवाई प्रक्रिया में आपका समय बर्बाद हो जाएगा। राजधानी के ऐसे ही दो मामले पर रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी ने सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया है। इस फैसले में रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी ने केस पंजीयन के लिए जमा शुल्क 1 हजार रुपये वापिस करने के साथ सिविल या राजस्व कोर्ट में जाने की सलाह दी है।

यह है मामला 

प्रकरण क्रमांक एम-ओटीएच-17-0714 के तहत डॉ मनमोहन पटेल ने बीते 22 दिसंबर को रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी में शिकायत दर्ज कराई। उन्होंने अपनी शिकायत में बताया कि खारखेड़ी जिला भोपाल स्थित LAKSHYA REALITIES BHOPAL की डाउन टाउन कॉलोनी में 1389 वर्गफिट का प्लॉट खरीदा। साथ ही प्लॉट की रजिस्ट्री भी करा ली गई। वहीं अब ASHIYANA BUILDERS BHOPAL द्वारा उनकी प्लाट पर बाउंड्री वाल बनाई जा रही है। उन्होंने अपने प्लाट वापसी के लिए रेरा में गुहार लगाई। वहीं ऐसी ही एक शिकायत विशाल जमारा ने भी प्रकरण क्रमांक एम-ओटीएच-17-0715 जिसमें बताया गया कि उनके खरीदे गए प्लाट पर भी बिल्डर द्वारा निर्माण कार्य कराया जा रहा है।

रेरा ने यह दिया फैसला

रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी ने दोनों ही मामलों पर फैसला सुनाया। इस फैसले में कहा गया कि खरीदार और विक्रेता के बीच खरीदी संबंधि या पजेशन संबंधि व्यवहार नहीं है। साथ ही शिकायतकर्ता रजिस्ट्री होने के बाद प्लाट के मालिक हैं। रेरा ने इस मामले में सिविल या राजस्व न्यायालय में प्रकरण दर्ज कराने की सलाह शिकायतकर्ताओं को दी।

क्या कहते है एक्सपर्ट

रेरा एक्सपर्ट सुमित गोठी ने बताया कि लोगों को रेरा प्रावधानों (RERA RULES) की जानकारी नहीं है। इसके लिए रेरा को जागरूकता के लिए कदम उठाना चाहिए। वहीं रेरा को एडवाजरी सेल के गठन की भी आवश्यकता है। ऐसे मामले जो लोगों को रेरा से सीधे तौर पर जुड़े लगते है लेकिन नियमों के कारण उनका दायरा रेरा से बाहर होता है। उन्हें शिकायत के दौरान ही आवेदक को बता देना चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति भी पैदा नहीं हो सकेगी। वहीं शिकायतकर्ताओं और रेरा का भी समय बचेगा।

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