इस भव्य और प्राचीन मंदिर की दीवारों पर लिखी है रामकथाएं | RELIGIOUS STORY

01 January 2018

हमीरपुर। उत्तर प्रदेश के HAMIRPUR जिले के खंडेह गांव में सैकड़ों साल पुराने रामजानकी मंदिर आज भी प्राचीनतम और भव्यता के लिये प्रसिद्ध है। मंदिर के निर्माण के लिये कर्नाटक और राजस्थान के तमाम कारीगर बुलाये गये थे जिन्होंने भिन्न-भिन्न पत्थरों से TEMPLE का निर्माण किया, लेकिन यह पूरा मंदिर (SHRI RAM JANKI MANDIR) एक ही पत्थर पर बना हुआ दिखता है। इस मंदिर में रखी रामजानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां अष्टधातु की है। आइना ए अकबरी के अनुसार मुगल सम्राट अकबर के समय खंडेह महाल (KHANDEH VILLAGE) कालिंजर सरकार के आधीन इलाहाबाद (ALLAHABAD) सूबे में था। मुगलों के बाद मराठाओं का शासन यहां रहा है। 

जिले के मौदहा तहसील क्षेत्र में दस हजार की आबादी वाला खंडेह गांव ऐतिहासिक रामजानकी मंदिर के लिये प्रसिद्ध है। यह गांव, सड़क और रेल मार्ग से जुड़ा है। कानपुर-बांदा एनसीआर में अकौना रेलवे स्टेशन ही खंडेह ग्राम का स्टेशन है। यहां से खंडेह गांव तक रास्ता पक्का बना हुआ है। स्टेशन से खंडेह गांव के दर्शनीय स्थल लगभग छह फलांग दूरी पर होंगे। खंडेह गांव पूरे चित्रकूट धाम, बांदा मंडल में दुबे का खंडेह कहलाता है। इसका नाम सरकारी जिला गजिटियर्स में भी आया है। 

इस गांव में सैकड़ों साल पुराना राम दरबार का मंदिर करीब एक एकड़ क्षेत्रफल में बना है। राम दरबार मंदिर तत्कालीन जमींदार चंदीदीन दुबे ने बनवाया था। इसमें राम लक्ष्मण और सीता की अष्टधातु की बहुमूल्य मूर्तियां विराजमान है। मंदिर में ग्रेनाइट पत्थर पर सम्पूर्ण रामकथा, महाभारत व कृष्ण लीला के प्रसंग चित्रित है। मंदिर में नवनिर्माण व मरम्मत का कार्य सुखदेव सहाय व भीष्मदेव दुबे ने कराया था। संगमरमर व ग्रेनाइट पत्थरों पर की गयी शिल्प व कला की दृष्टि से बारीक नक्काशी तथा भव्यता बेजोड़ है। दक्षिण मुखी हनुमान जी की प्रतिमा भी यहां विराजमान है।

रामजानकी मंदिर के पुजारी राकेश कुमार बाजपेई भीष्मदेव दुबे के पारिवारिक सदस्य है जो मंदिर की पूरी तरह से देखभाल कर रहे हैं। उन्होंने इस मंदिर के बारे में बताया कि चंदीदीन दुबे का वर्ष 1902 में निधन होने के बाद श्रीराम जानकी मंदिर वीरान सा पड़ा रहा। नतीजतन गांव के कुछ लोगों ने इसमें तोडफ़ोड़ कर क्षति पहुंचायी। मगर वर्ष 1942 में चंदीदीन दुबे के पौत्र सुखदेव सहाय दुबे ने मंदिर के शेष निर्माण कार्य पुराने और गढ़े अधगढ़े पत्थरों से कराया। सुखदेव सहाय के निधन के बाद दुबे परिवार के हिस्सेदार बाजपेई परिवार ने भी मंदिर में अधूरे कार्य पूरे कराये है। यह मंदिर विलक्षण कारीगरी के लिये पूरे बुन्देलखण्ड क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

भारत में ऐसी कलाकृतियां दक्षिण व कर्नाटक और राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, अजमेर, जैशलमेर में विशेष रुप से पाये जाते हैं। राकेश कुमार बाजपेई ने बताया कि रामजानकी मंदिर को बनवाने के लिये इन्हीं जगहों से कारीगरों को बुलवाया गया था जिन्हें उस जमाने में चांदी के कम से कम बीस रुपये और अधिक से अधिक चांदी के साठ रुपये प्रतिदिन मजदूरी के रुप में दी जाती थी। पूरे मंदिर में नक्काशी और देवी देवताओं की मूर्तियों को तराशा गया है। भिन्न-भिन्न पत्थरों को मिलाकर पूरे मंदिर के निर्माण में इस तरह सेट किया गया है कि कोई पत्थरों के जोड़ को नहीं भांप सकता है। सारा मंदिर एक दृष्टि में एक ही पत्थर का बना हुआ दिखता है। मंदिर के निर्माण के लिये पत्थर चित्रकूट जिले के ग्राम खोह के पहाड़ों से बैलगाड़ियों से यहां लाया गया था जिनके चिन्ह आज भी गांव में मिलते हैं।

खंडेह गांव निवासी राकेश कुमार बाजपेई ने बताया कि रामजानकी मंदिर में बड़े देव बाबा पहले पुजारी थे जो बहुत ही सिद्ध योगी पुरुष थे। उन्होंने बताया कि बड़े देव बाबा इससे पहले पूर्व नवाब वाजिद अली शाह लखनऊ के यहां काम करते थे। वहां से खंडेह आकर मंदिर के पुजारी बन गये थे। उस समय नित्य विधिवत पूजन भोग एवं आरती होती थी। मंदिर निर्माण में कई कथानक भी जुड़े हैं। यह मंदिर गांव के दक्षिण पूर्व दिशा में कलार तलाब के किनारे स्थित है। मंदिर के गर्भगृह में कई देवी देवताओं की मूर्तियां विराजमान है जो स्वयं में जीवन्त सी प्रतीत होती है।

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