मुकदमे करो तुम, फीस भरे हम

Wednesday, April 5, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। जब-जब किसी राजनेता की जुबान या काम कठघरे में होते है जेब आम नागरिक की कटती है। उदाहरण अरविंद केजरीवाल है। जब जब अदालतों में बोले तब-तब दिल्ली की जनता की जेब कटी है। अरविंद केजरीवाल ने अपनी बदज़ुबानी की वजह से दायर मुकद्दमा लड़ने के लिए। करोड़ों रुपए के वकील को नियुक्त कर दिया और ऐसी व्यवस्था कर दी कि उसकी फीस जनता की जेब से जाएगी। ये बात तब सामने आई जब वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी ने अपनी फीस के बारे में बताते हुए दिल्ली सरकार को एक चिठ्ठी लिखी और कहा कि वो केजरीवाल का केस लड़ने के लिए एक करोड़ रुपये की रिटेनरशिप फीस लेंगे और कोर्ट में हर सुनवाई के लिए 22 लाख रुपये लेंगे।

ये केस दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली की तरफ से दायर किए गए मानहानि के मुकदमे का है। ऐसे मुकदमे देश में कई राजनेताओं पर कई स्थानों पर  चल रहे हैं। इनमे सरकारी खाजने से करोड़ों रूपये की फीस और अन्य खर्चे होते हैं जिनका  सीधा सम्बन्ध जनता की कमाई से बने राज कोष से है।

इसी तरह दिल्ली और अन्य राज्यों में मंत्रियों में चल रहे मुकदमों या उनके बचाव में यह प्रक्रिया कही अनुमति से तो कहीं बगैर अनुमति के जारी है। इसमें कोई भी मंत्री अपने साथी मंत्री के बचाव के लिए प्रस्ताव ले आता है और केबिनेट में मंजूरी हो जाती है।

राम जेठमलानी ने तो कह दिया की हिसाब से पिछली 11 सुनवाइयों के लिए उनकी फीस 2  करोड़ 42 लाख रुपये हुई और अरविंद केजरीवाल ये पैसा खुद नहीं बल्कि जनता की जेब काटकर देना चाहते थे। दूसरी जगह तो वकील भी शांत रहते है। सरकार भी मजे से जनता की कमाई को फूंक देती है।

होना यह चाहिए की ऐसे मामलों में ये पैसा नेता खुद अपनी जेब से दे। ऐसे केस वेसे भी जनता की भलाई के लिए लगाए थे। अरविंद केजरीवाल ने ये आरोप अपनी राजनीति चमकाने के लिए नही लगाए जाते हैं। इसलिए मानहानि के केस के पैसे उन्हें खुद अपनी जेब से देने चाहिए और अगर उनके पास पैसे नहीं हैं तो उन्हें कोई ऐसा वकील करना चाहिए जो मुफ्त में मुकदमा लड सके, राज्यों के राज्यपाल और सरकार के मुख्य के सचिव को बारीकी से यह तय करना चाहिए की मुकदमा कितना निजी है और उसका कितना लाभ किसे मिलेगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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