देखो शिवराज, तुम्हारे मप्र में कर्मचारियों के बीच वर्ग संघर्ष शुरू हो गया

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प्रिय शिवराज, 
12 जून 2016 को भोपाल के टीटी नगर दशहरा मैदान में तुमने जो जहरीला बीज (कोई माई का लाल आरक्षण खत्म नहीं कर सकता) बोया था। वो कितनी जल्दी पनप गया। अभी 6 महीने भी नहीं हुए और मध्यप्रदेश के कर्मचारियों में वर्ग संघर्ष शुरू हो गया। तुम्हारे एक बयान ने वो कर डाला जो इतिहास में कभी नहीं हुआ था। मप्र के कर्मचारी दो वर्गों में बंटे हुए साफ-साफ दिखाई दे रहे थे। एक दूसरे से जूझ रहे हैं, षडयंत्र करने लगे हैं। 

प्रिय शिवराज, 
मैं छतरपुर में हुए घटनाक्रम की बात कर रहा हूं। यह मप्र में वर्ग संघर्ष की पहली घटनाओं में से है। नौगांव नगर के कन्या छात्रावास में कुछ माह पहले एक बालिका की मृत्यु हो गई थी। जिसमें कलेक्टर छतरपुर के निर्देश पर छात्रावास अधीक्षिका लतासिंह अहिरवार को निलंबित कर दिया गया था। चौकीदार देवीदीन कुशवाहा पिछले 22 वर्षो से इसी छात्रावास में पदस्थ थे जिसका तबादला पटौरी बिजावर जनपद के छात्रावास मे कर दिया गया था और छात्रावास का प्रभार सविता शर्मा को सौंपा गया। 

कलेक्टर के अनुसार व्यवस्था बदली गई थी परंतु आरक्षित वर्ग के कर्मचारियों के बीच कुछ और संदेश भेजा गया। आरक्षित वर्ग की अधीक्षिका और चौकीदार को हटाकर अनारक्षित वर्ग की अधीक्षिका को उसकी कुर्सी सौंपी गई। आरक्षित वर्ग के कर्मचारी नेताओं ने इसके लिए आदिम जाति कल्याण विभाग के जिला संयोजक केके शुक्ला को दोषी माना, क्योंकि वो भी अनारक्षित वर्ग से हैं। कलेक्टर का कुछ कर नहीं सकते थे, इसलिए केके शुक्ला उनका साफ्ट टारगेट बन गए। 

सस्पेंड हुई आरक्षित वर्ग की अधीक्षिका के पति श्री डीआर अहिरवार भी शासकीय सेवक हैं। अत: वर्ग संघर्ष को आसानी से हवा दे दी गई। एक षडयंत्र रचा गया। 7 सिंतंबर को निलंबित अधीक्षिका लतासिंह, उनके पति डीआर अहिरवार और चौकीदार देवीदीन छात्रावास की करीब 50 छात्राओ को स्कूल जाते समय चार पहिया वाहनो में बैठाकर छतरपुर ले आए। जहां जनसुनवाई में कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा। जब यह छात्राएं वापस जा रही थी तभी जिला संयोजक वहां पंहुचे तो उनकी नजर चौकीदार देवीदीन पर पड़ गई। उन्होंने वहीं चौकीदार को अपना छात्रावास छोड़कर मुख्यालय आने के लिए लताड़ लगा दी। बस यही गुनाह हो गया। 50 छात्राओं का ब्रेनवॉश किया जा चुका था। उन्हे समझाया जा चुका था कि अनारक्षित वर्ग के अधिकारियों को किसी भी कीमत पर हावी मत होने देना नहीं तो तुम्हे भी वही प्रताड़नाएं झेलनी होंगी जो तुम्हारे पूर्वजों ने झेलीं थीं। 

जब जिला संयोजक ने अपने विभाग के चौकीदार को डांटा तो श्री डीआर अहिरवार समेत उनकी पत्नी लता सिंह ने छात्राओं को भड़का दिया। यह दंपत्ति लगातार छात्राओं के साथ बना रहा और कलेक्ट्रेट में हंगामा करवाया। अंत में कलेक्टर को मौके पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक नीरज पांडे और एसडीएम श्री द्धिवेदी को भेजना पड़ा। यहां जब बात नहीं बनती नहीं दिखी तो अधिकारियों के कहने पर ये लोग कलेक्ट्रेट से तो चले आए लेकिन छतरपुर शहर के मुख्यमार्ग पर जुलूस निकालते हुये चौक बाजार पर जाम लगा दिया। कई दलित नेताओं को बुला लिया गया, जो शायद पहले से ही ऐसे मौके का इंतजार कर रहे थे। कोतवाली में जिला संयोजक के खिलाफ रिपोर्ट लिखवा दी गई। 

सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से किया गया। तमाम दलित नेताओं और छात्राओं को जिला संयोजक से कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन सबकुछ इसलिए किया गया क्योंकि वो अनारक्षित वर्ग से हैं और उन्होंने लता ​अहिरवार के बदले सविता शर्मा को पदस्थ कर दिया था। जातिवाद की आग सुलगाई गई और एक आॅपरेशन सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। 

प्रिय शिवराज, 
कार्रवाईयों का शिकार होने वाले अक्सर जातिवाद की ढाल तलाश ही लेते हैं, लेकिन यह पहली बार हुआ कि एक षडयंत्र रचा गया और इस स्तर पर उसे अमल भी किया गया। मेरी नजर में गलती इनमें से किसी की भी नहीं है। गलती तो तुम्हारे उस बयान की है जो तुमने 12 जून 2016 को भोपाल के टीटी नगर दशहरा मैदान में दिया था। 

हे शिवराज, 
तुम्हारा एक बयान मप्र की सूरत बदलता जा रहा है। जिस मध्यप्रदेश में कभी जातिवाद नहीं था। सपा और बसपा जैसी पार्टियां जिस मप्र की संस्कृति में कभी जातिवाद का जहर नहीं घोल पाईं, तुमने एक झटके में कर दिखाया। चुनाव जीतने के लिए यह तुम्हारा हथकंडा हो सकता है परंतु इतिहास तुम्हे मप्र को जातिवाद में जला डालने के लिए हमेशा याद रखेगा। यह तो शुरूआत है, तारीख गवाह है, जातिवाद की आग में कई विकसित संस्कृतियां बर्बाद हो चुकीं हैं। उत्तरप्रदेश और बिहार जैसे समृद्धशाली राज्य मिट गए। बस मेरा मप्र बाकी बचा था। वो भी तुमने...। 
  • लेखक उपदेश अवस्थी भोपाल के युवा पत्रकार हैं। 
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