अध्यापक संवर्ग: वो शिवराज की संवेदनशीलता थी या ढोंग

Updesh Awasthee
डी.के.सिंगौर। मुख्यमंत्री शिवराज सिहं चज्ञेहान ने 24 दिसम्बर 2015 को मुम्बई से जिस अनोखे अंदाज और संवेदनशीलता दिखाते हुये अध्यापकों को छठवें वेतनमान का लाभ दिये जाने की घोषणा की वह अब सिर्फ और सिर्फ ढ़ोंग नजर आ रहा है। 

मुख्यमंत्री ने अपने पिताश्री की बीमारी के चलते नाटकीय ढंग से घोषणा करके अपने आप को बेहद संवेदनशील और अध्यापकों के प्रति सहानुभूति रखने वाला जता कर तत्काल में खुश करने की सफल कोशिश की लेकिन अब मुख्यमंत्री, मंत्री और अधिकारी सबकी चतुराई ही सामने आ रही है। अध्यापकों की उम्मीद से अच्छा देने की बात करके अध्यापक की हड़ताल रूकवा दी और दिया तो क्या, 2016 से छठंवा वेतनमान, जबकि अध्यापक मांग रहे थे 2015 से पूरा छठवां वेतनमान। 

यही वेतनमान यदि 1 माह पहले दे देते तो कितना और बजट बढ़ जाता पर अध्यापकों की बात तो रह जाती। अध्यापकों ने फिर भी संतोष कर लिया, 1 जनवरी 2016 से छठवें वेतनमान का लाभ दिये जाने का 2 लाइन का आदेश देने में सरकार के अधिकारियों ने 2 माह लगा दिया वो भी अध्यापकों के हल्ला मचाने और सड़क में उतरने के बाद। एक कल्याणकारी राज्य की एक कल्याणकारी सरकार को क्या यह शोभा देता है कि वह अपने ही कर्मचारियों और खासकर शिक्षा जैसे उत्कृष्ट कार्य में लगे अध्यापकों के साथ छल करे। 

2013 की हड़ताल में यह करार हुआ था कि शिक्षक के समान पूरा वेतन 2016 में दिया जायेगा और नोटशीट भी बनी पर जब आर्डर जारी किया तो 2016 की जगह 2017 कर दिया। अब अध्यापकों ने 2017 की जगह 2015 में छठवां वेतनमान दिये जाने की मांग करके सरकार के सामने गुनाह कर लिया, जो 2017 में समायोजन के नियमों को ही बदल डाला। जो कि केबिनेट की संक्षेपिका से साफ उजागर हो गया कि लाभ देने की बजाय नेता और अधिकारियों ने अध्यापकों के साथ छल और चतुराई दिखाई है। 

अध्यापक 2013 से छठवां वेतनमान की आस लगाये थे उस पर पानी फिर गया। अध्यापक मन मसोस कर रह गया, कहने को तो दर्जन भर अध्यापकों के संगठन हैं पर किसी ने भी अधिकारियों से अंतरिम राहत की परिभाषा नहीं पूछी। ये भी नहीं पूछा कि 2013 से 2015 तक जो दिया क्या वो छठवें वेतनमान का हिस्सा नहीं था। यदि नहीं था तो जो दिया वो पूरा वसूलते क्यों नहीं और यदि है तो 2013 से ही छठंवा वेतनमान क्यों नहीं देते। अब तक अंतरिम राहत कर्मचारियों को कब कब दी गई और उसका समायोजन अध्यापकों जैसा ही किया क्या कई संगठनों की चक्की में पिसता अध्यापक इस पर भी संतोष करके अब आगे बात चला दी कि 1 जनवरी 16 से ही सही पर विसंगति रहित गणना पत्रक ही जारी कर दिया जाये। 

अब गणना पत्रक के लिये अध्यापक सड़को पर हैं। जनता भी सोचती है अजीब संवर्ग बनाया है सरकार ने जब से भर्ती हुये हैं जब देखो तब सड़को पर ही दिखाई देते हैं कभी वेतन बढ़ाने के लिये तो कभी वेतन पाने के लिये। सरकार देती 1 बार है और ढिढ़ोरा पीटती 10 बार है, जनता तो सोचती है दसों बार अध्यापकों को कुछ मिला। जब सरकार ने 2013 में शिक्षक के समान वेतन देने का नियम बना लिया तो फिर देती क्यों नहीं, जब छठवें वेतनमान का नगद लाभ अप्रैल 2016 से देने का आदेश कर दिया और अप्रैल माह खत्म होने को है तो अध्यापकों की चिंता जायज है। गणना पत्रक में लेट लतीफी सब सरकार के कूटनीतिज्ञ नेता और अधिकारियोें की चाल है जिससे एक तो अध्यापक संगठन आपस में लडे और कमजोर पडे़ और दूसरा अध्यापक इतने हताश हो जायें कि कहने लग जाये जो देना हो दे दो पर दे दो। 

तीन साल से बेहिसाब वेतन विसंगति की मार झेल रहे अध्यापक अबकी बार विसंगति रहित आदेश ही चाहते हैं। सरकार के कूटनीतिज्ञ नेता और अधिकारियों को भी यही सलाह है, कि विसंगति रहित आदेश ही जारी कराया जाये। यदि 2013 के चार किस्तों के आदेश में यदि बड़ी विसगंतियां न रही होती तो 2017 तक तो कम से कम कोई आंदोलन खड़ा नहीं होता। वास्तव में विसंगति को लेकर ही अध्यापकों में आक्रोश पनपा, यदि फिर विसंगति रही तो अध्यापकों एक बार फिर सड़कों में आने से कोई नहीं रोक सकता। यदि ऐसा हुआ तो फिर सरकार का दिया न दिया सब बराबर हो जायेगा। सरकार गौर करे कि विसंगति रहित आदेश में अध्यापक क्या चाहते हैं, बस यही कि सहायक अध्यापक और वरिष्ठ अध्यापकों के प्रारभ्भिक वेतन की गणना क्रमशः 7440 और 10230 से हो, क्रमोन्नत और पदोन्नत अध्यापकों को न्याय मिले, वेतनमान के निर्धारण में वरिष्ठता का ध्यान हो। 

इनमें कौन सी मांग नाजायज है। जो शिक्षकों के लिये है वहीं तो अध्यापक मांग रहे हैं। यहां पर अध्यापक संगठन जरूर एक गलती कर रहे हैं, मांग की जा रही है कि विसंगति रहित गणना पत्रक जारी किया जाये, अब जिसे हम अध्यापक विसंगति मानते हैं उसे सरकार नहीं मानती तो उसका क्या। सरकार तो अपने हर आदेश को विसंगति रहित ही मानती है तभी तो वो जारी होता है। गलती यह है कि किसी संगठन ने सार्वजनिक ढंग से ये मांग नहीं रखी कि गणना पत्रक जारी करने से पहले उसका अवलोकन कराया जाये ऐसी मांग संगठन का अधिकार भी है और इस मांग को मानना प्रजातांत्रिक सरकार का दायित्व भी है। अब चिंता की बात यह है कि समान कार्य समान वेतन के लिये ढाई हजार करोड़ का हिसाब बताने वाले अधिकारी और मंत्री सवा सौ करोड़ में कैसे शिक्षकों के समान वेतन देते हैं।
  • लेखक राज्य अध्यापक संघ के मंडला जिलाध्यक्ष हैं। 

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