राकेश दुबे@प्रतिदिन। कल प्रधान मंत्री की बात सुनकर देश के प्रधान न्यायाधीश भावुक हो गये और सारा दोष न्यायपालिका के मत्थे मढने पर प्रश्न चिन्ह भी लगाया| देश में कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका अपनी जिम्मेदारी एक दूसरे के मत्थे मढने के आदी हैं | देश के सारे प्रशासन जिसमे न्यायपालिका भी शामिल है, को जनतांत्रिक तकाजों के अनुरूप यानी उसे लोगों के प्रति अधिक संवेदनशील और अधिक जवाबदेह बनाने के मकसद से समय-समय पर आयोग बने, समितियां गठित हुर्इं, उन आयोगों और समितियों की रिपोर्टें धूल खा रही हैं। इसलिए कि उनकी सिफारिशों पर अमल करने की इच्छाशक्ति हमारे राज्यतंत्र या राजनीतिक नेतृत्व ने नहीं दिखाई। पुलिस सुधार के लिए बनी सोली सोराबजी समिति की रिपोर्ट तो सुप्रीम कोर्ट की कई बार की हिदायत के बाद भी लागू नहीं हो पाई। अमल न करने के पीछे राज्य सरकारों की दलील रही है कि इन्हें लागू करना उनके अधिकारों में कटौती करना होगा; फिर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के उनके दायित्व के पालन में कठिनाई भी आएगी। असली कारण है कि पुलिस पर अपना अंकुश कोई भी सरकार कम करना नहीं चाहती।
दूसरी समितियों या आयोगों की सिफारिशें भी इसीलिए लागू नहीं की गर्इं, क्योंकि उन्होंने प्रशासनिक निर्णयों और कामकाज की संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता सुनिश्चित करने की अपेक्षा करते हुए उन्हें राजनीतिक दखलंदाजी से मुक्त रखने पर जोर दिया था। जो राजनीतिक संस्कृति प्रशासन से मनमाने ढंग से काम लेने, तबादलों के जरिए किसी को पुरस्कृत तथा किसी को दंडित करने की आदी हो चुकी है, उसे कानून का शासन तथा निष्पक्षता के मूल्य कैसे रास आ सकते हैं!
देश में सारे अधिकारियों का मनोबल बढ़ाने, देशसेवा में बढ़-चढ़ कर योगदान के लिए आह्वान करने, आपसी सहयोग बढ़ाने जैसी भली-भली बातें की जाती रही हैं। देश में सरकारी परियोजनाएं ठप हैं और कई प्रमुख कार्यक्रमों में अपेक्षित गति नहीं आ पा रही है। निश्चय ही, सरकार के फैसलों, नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन का दारोमदार नौकरशाही पर रहता है। अफसर अधिक तत्परता और अधिक कुशलता से काम कर सकें, इसके लिए यह भी देखना होगा कि उन पर प्रक्रियाओं तथा औपचारिकताओं का बोझ कैसे कम किया जाए। इसके लिए कई सुझाव सुधार समय-समय पर बनी समितियों की रिपोर्टों में मौजूद हैं। नई चुनौतियों तथा नई तकनीकों के मद््देनजर कुछ नए उपाय भी सोचे जाने चाहिए। बदलाव तो तभी हो सकते हैं जब सरकारों में इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति हो।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
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