इंदौर। मप्र की पंचायतों में 263 करोड़ का पंच भत्ता घोटाला प्रकाश में आया है। इससे पहले शौचालय घोटाला भी सामने आ चुका है। आए दिन पंचायतों में कोई ना कोई घोटाला चलता ही रहता है। कुछ सामने आते हैं तो कई दबे रह जाते हैं। इसकी मुख्य वजह ग्राम पंचायतों का ऑडिट नहीं होना है। 544 ऑडिटर के पदों में से 381 खाली पड़े हैं। यानी 65 फीसदी पंचायतों के लिए ऑडिटर ही नहीं हैं। इस कारण बिना हिसाब-किताब के ही हजारों करोड़ की राशि खर्च हो रही है।
23 हजार पंचायतों के लिए 69 ऑडिटर
वर्ष 1995 से ग्राम पंचायतों का ऑडिट पंचायत विभाग ही करवाता था। 2008 से इसकी जिम्मेदारी लोकल फंड ऑडिट विभाग को दे दी गई। इससे उसके पास 23 हजार 03 ग्राम पंचायतों के ऑडिट की जिम्मेदारी भी आ गई। उधर, मैदानी अमला बढ़ाने के बजाय अधिकारियों के पद बढ़ा दिए गए। एक एडिशनल डायरेक्टर, 7 संभागों में एक-एक डिप्टी और ज्वाइंट डायरेक्टर के नए पद स्वीकृत किए गए।
लेकिन पंचायतों के ऑडिट के लिए विभाग के 69 ऑडिटर ही रहे। एक ऑडिटर को एक महीने में अधिकतम 10 ग्राम पंचायतों का लक्ष्य दिया जाता है। यानी एक ऑडिटर एक साल में 120 और 69 ऑडिटर 8280 पंचायतों का ही ऑडिट कर सकेंगे। जानकारों के अनुसार ठीक से ऑडिट हो तो ये संभव नहीं। उसके बाद भी 14,723 पंचायत बिना ऑडिट के ही रह जाएंगे।