साल दर साल हो रही किल्लत, कुछ तो रास्ता होगा

Updesh Awasthee
राकेश दुबे@प्रतिदिन। छापो के असर कहें या कुछ और अरहर की दाल खुदरा बाजार में 185 रुपये प्रति किलोग्राम तक आ गई है। हो सकता है जब बरामद हुई दाल बाजार में आए तो कीमतें शायद तेजी से घटें। वैसे दालों की कीमतों को जितनी ऊंचाई तक जाना था, वहां वे पहुंच चुकी हैं और जिन्हें अतिरिक्त मुनाफा कमाना था, वे कमा चुके हैं। ऐसा नहीं कह सकते हैं कि अब दाल की कीमतें सामान्य हो जाएंगी, क्योंकि बारिश इस बार कम हुई है, जिससे दालों का उत्पादन कम ही रहेगा। सरकार सक्रिय रही, तब भी दालों की कीमतें आसमान छूने की तरफ बढ़ेंगी ही।

हरित क्रांति के 50 साल बाद वे दिन बहुत पीछे छूट चुके हैं, जब हर चीज की कमी होती थी और राशन की दुकानों पर गेहूं, चावल और चीनी के लिए लंबी लाइनें लगती थीं। तब जमाखोरों और कालाबाजारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की घोषणाओं की खबरें भी आम थीं। यहां तक कि फिल्मों में भी खलनायक अनाज के जमाखोर और कालाबाजारिए हुआ करते थे। वह जमाना बीत गया, लेकिन आज भी हर साल-दो साल पर किसी चीज की किल्लत हो जाती है, दाम आसमान छूने लगने लगते हैं और फिर जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई की खबरें पुराने दिनों की याद दिलाती हैं। ऐसा कभी प्याज के साथ होता है, कभी चीनी, कभी खाद्य तेल, तो कभी दालों के साथ। भारत जैसे विशाल देश की खाद्यान्न की जरूरत भी बड़ी है और किसी भी खाद्य-वस्तु के उत्पादन में कमी से उसके दाम आसमान चढ़ जाते हैं। हमारे यहां अब भी खाद्यान्नों की जरूरत और उत्पादन के बीच तालमेल नहीं है, न ही खाद्यान्नों के उत्पादन या आयात में भविष्य की जरूरतों को मद्देनजर रखकर योजनाएं बनाई जाती हैं। अचानक दाम बढ़ते हैं, तो पता चलता है कि जरूरत और उपलब्धता के बीच काफी बड़ी खाई है। इसके अलावा, भारत का वितरण और व्यापार तंत्र ऐसा है कि कुछ थोक व्यापारी किसी चीज की फौरी कमी को तुरंत भारी मुनाफे का जरिया बना लेते हैं। इन थोक व्यापारियों के छोटे-छोटे समूह हैं, जिनका किसी वस्तु के व्यापार पर एकाधिकार होता है, वे स्थानीय राजनीति में भी शक्तिशाली होते हैं, जिससे उनका एकाधिकार बना रहता है।

केंद्र सरकार इस बार दालों की कीमत में बढ़ोतरी से चेती है और उसने खाद्यान्नों के भविष्य की मांग का आकलन करने के लिए एक स्थायी विशेषज्ञ समिति के गठन का फैसला किया है। सरकार ने दालों का 35000 टन का बफर स्टॉक बनाने का फैसला भी किया है, ताकि दाम बढ़ने की स्थिति में बाजार में आपूर्ति बढ़ाकर दामों को नियंत्रित किया जा सके। इसके अलावा, एक बड़ी जरूरत खाद्यान्नों के थोक व्यापार को खोलने की भी है, ताकि व्यापारियों का छोटा सा समूह दालों के दामों को अपने स्वार्थ से नियंत्रित न कर पाए। 

श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com

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