युवाओं का हाथ थाम लीजिए, समाज अपने आप बदल जाएगा

Updesh Awasthee
सुशील कुमार शर्मा। दो दृश्य हैं, पहले में मैं मंदिर जा रहा था कि अचानक पीछे से किसी के चीखने के आवाज आई देखा एक लड़की सड़क पर गिरी है और दो लड़के मोटर साईकिल पर तेजी से बाजु से निकल गए। दौड़ कर लड़की को उठाया तो पता चला की पीछे से धक्का मार  कर वो लड़के भाग गए। लड़की को थोड़ी सी चोट आई थी, पट्टी करवा कर उसे घर पहुँचाया। मन विचलित हो गया था।

दूसरा दृश्य चौराहे का था एक लड़की स्कूटी  से गिर गई थी बुरी तरह से जख्मी हो कर बेहोश हो गई थी कालेज के लड़के दौड़ते आये उसे तुरंत उठा कर हॉस्पिटल ले गए उसके घर फोन कर माता पिता को बुला लिया सिर पर चोट लगी थी अगर समय पर सहायता न मिलती तो कुछ भी हो सकता था। मन में आशा का संचार हुआ खोया विश्वास पुनः लौट आया।

दोनों स्थितियां विपरीत हैं। एक में संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है तो दूसरी घटना संवेदनशीलता को नई ऊचाईयां प्रदान करती है।

युवा पीढ़ी भटकाव के रस्ते पर है। इसका मुख्य कारण  पारिवारिक संस्कारों का आभाव एवं सामाजिक मूल्यों में बदलाव प्रमुख है। दूर संचार तकनीक के विकास के साथ दुराचार एवं आप संस्कृतियाँ समाज में व्याप्त हो चुकी हैं।युवाओं में भावनात्मक भटकन है। इसका मुख्य कारण शिक्षा का अधूरापन है। शिक्षा सिर्फ किताबों में सिमट कर रह गई है। नैतिक मूल्यों का समाज से पलायन जारी है। परिवार एकल होने कारण अच्छे नैतिक शिक्षा के संस्थान नहीं बन पा रहे हैं। माता पिता स्वयं भ्रमित हैं उन्हें अपनी प्राथमिकताएं ही नहीं पता सिर्फ पैसा कमा  कर कोई भी अपनी संतान को योग्य नहीं बना सकता है।

लक्ष्य की खोज न कर पाने से युवा दिग्भ्रमित है। ओछे आकर्षण उसे लुभा कर गहरे गर्त में धकेल रहे हैं 'किसी भी कीमत पर सफलता 'का आकर्षण माँ बाप एवं युवाओं को विनाश की ओर ले जा रहा है।

नैतिकता की ढहती दीवारें यौवन को विनाश की और ले जा रहीं हैं। मर्यादाओं एवं वर्जनाओं को लांघती जवानी नष्ट हो रही है। आज युवा जिस रास्ते पर अग्रसर है उसमें स्वछन्दता तो है लेकिन स्वतंत्रता नहीं है। आज के युवा का जीवन भ्रम और भ्रान्ति में कट रहा है। महानगरीय संस्कृति ने युवाओं की वर्जनाओं को तोड़ दिया है। भड़कीले परिधान अंगप्रदर्शन करने वाले कपड़े ,कान में लगे इयर फोन ,हाथों में मंहगा मोबाइल और आँखों से गायब होती शर्म ये महामारी महानगरों से कस्बों व गांवों में फेल चुकी है।

टीवी ,इंटरनेट एवं मोबाइल जहाँ  दूरसंचार के क्षेत्र की क्रांति बन कर उभरे हैं वहीँ उनके दुष्परिणाम भी आज समाज भुगत रहा है। इनके गलत उपयोग से समाज की परम्परागत आस्थाएं ,मान्यताएं एवं मूल्यों में विकृति आ चुकी हैं जीवन के श्रेष्ठता के मानदण्ड बदल गए हैं। चिंतन की विकृति से चरित्र भी विकृत हो गया है।

आज के युवा में व्यवहारिक सामंजयस्य ,बौद्धिक श्रेष्ठता एवं सामाजिक प्रतिबद्धता का आभाव है। वह सिर्फ किताबी ज्ञान एवं मशीनों में उलझ कर भ्रमित है। समाज एवं नैतिक संस्कारों से उसका सरोकार ख़त्म हो चुका है।

लेकिन आशा की किरण अभी बाकी है। युवाओं को सही रास्ता दिखाना होगा क्योंकि जब तक युवक अपनी मौलिक विशेषताओं एवं संभावनाओं को नहीं समझेंगे तब तक भटकाव जारी रहेगा। युवाओ में संकल्पशक्ति जागृत होनी चाहिए संकल्प से व्यक्ति संयमित एवं दृढ़ प्रतिज्ञ हो जाता है असंभव से संभव करने की यह ऊर्जा संकल्प शक्ति ही है।

युवाओं को ऐसे मार्गदर्शक की जरूरत हे जिनके सानिध्य में युवा ऊर्जा का ऊर्ध्व गमन हो ,पवित्र एवं परिष्कृत जीवन शैली अपनाने की प्रेरणा मिले।जिन का अनुकरण करके युवा अपने अंदर साहस ,संवेदना ,सेवा और सृजन के गुणों को अपने में विकसित कर सकें।

आज के युवा को जरूरत है जिंदगी को नए सिरे से समझने की अपने अंदर की विकृतियों से लड़ कर सृजनात्मक चिंतन विकसित करने की और समाज को इस कार्य में युवाओं की सहायता करना चहिये।

सुशील कुमार शर्मा
वरिष्ठ अध्यापक
शासकीय आदर्श उच्च .माध्य. विद्यालय गाडरवारा
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