मोदी और मनमोहन सरकार में कोई फर्क नहीं

Updesh Awasthee
राकेश दुबे@प्रतिदिन। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) की ताजा जारी रिपोर्ट प्रमाणित करती है कि आम आदमी को पिछले दो दशक के उदारीकरण राज में भारी कीमत चुकानी पड़ी है और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था की प्रबल समर्थक मोड़ो सरकार में गरीब और अमीर के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है।


सर्वे में शहरों के सबसे संपन्न 10 प्रतिशत लोगों की औसत संपत्ति 14.6 करोड़ रुपए आंकी गई, जबकि सबसे गरीब 10 प्रतिशत की महज 291 रुपए। यानी शहरी अमीरों के पास गरीबों के मुकाबले 5 लाख गुना ज्यादा धन-दौलत है। गांवों में कुबेर और कंगाल आबादी की संपत्ति का अंतर थोड़ा कम है, फिर भी यह 23 हजार के आसमानी अंतर पर है। गांवों में सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों की औसत संपत्ति 5.7 करोड़ रुपए और सबसे गरीब दस फीसद की 2507 रुपए है। शहर के अमीर आदमी के पास गांव के रईस की अपेक्षा लगभग ढाई गुना दौलत है। गरीबों के मामले में आंकड़ा उलट है। गांवों के गरीब के पास शहर के कंगाल की अपेक्षा 8 गुना से अधिक धन है। इसका अर्थ यही हुआ कि गांव छोड़ कर शहर जाने वाले किसान-मजदूरों की माली हालत में कोई विशेष अंतर नहीं आया है।

रिपोर्ट के अनुसार आज गांवों की एक तिहाई और शहरों की एक चौथाई आबादी कर्ज के बोझ तले दबी है। जहां सन 2002 में गांवों के 27 प्रतिशत लोगों ने ऋण ले रखा था वहीं 2012 में 31 प्रतिशत लोगों पर कर्ज चढ़ा था। इन दस वर्षों में ऋण की रकम भी बढ़ कर लगभग दो गुना हो गई।

महंगा मकान खरीदने के मोह में शहरों में एक दशक के भीतर कर्ज की रकम सात गुना से ज्यादा हो गई। सन 2002 में शहरों में औसत कर्ज १11771 रुपए था, जो 2012 में बढ़ कर 84625 रुपए हो गया।

सर्वे के अनुसार गांवों में 58 प्रतिशत कृषक परिवार हैं। कृषक परिवार वह है, जिसका कम से कम एक सदस्य खेती करता हो और जो एक वर्ष में कम से कम 3 हजार रुपए खेती से कमाता हो। वर्तमान में 90 प्रतिशत किसानों के पास दो हेक्टेयर से कम और एक तिहाई के पास केवल 4.4 हेक्टेयर जमीन है। जोत के घटते आकार की वजह से आधे से अधिक किसानों पर कर्ज चढ़ा हुआ है। इसी कारण गांवों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं। गृह मंत्रालय और नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट इसे प्रमाणित करती है।

लेखक श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703
rakeshdubeyrsa@gmail.com


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