“भारत से न्यू इण्डिया”- पहले आज़ादी के अर्थों को जानें

Wednesday, August 16, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। स्वतंत्रता दिवस पर भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने “न्यू इण्डिया” की और देश को ले जाने की बात कहते हुए नागरिकों से सहयोग माँगा है। देश में एक विचार धारा आजादी के वर्तमान स्वरूप को भी पूर्ण नहीं मानती है। वैसे बीते सात दशकों के दौरान राजनीतिक स्वतंत्रता को ही स्वतंत्रता जाना और माना गया है। जिस अनुपात में राजनीतिक आज़ादी लाई गई, आर्थिक आजादी नहीं मिली। भारत सरकार ने अपने शुरुआती दौर में देश की आबादी के बड़े तबके को आर्थिक स्वतंत्रता नहीं दी। 

संपत्ति के अधिकार कभी सही अर्थों में संरक्षित नहीं किए गए और उद्यमिता पर समाजवादी शैली के नियंत्रण लगा दिए गए। 1991 में हुए आर्थिक सुधारों के ढाई दशक बीत चुके हैं। इस अवधि में भी पूरा नियंत्रण समाप्त नहीं हुआ है। भारत अभी भी ऐसा देश है जहां कारोबारी जगत के सामान्य कामकाज में हस्तक्षेप होता है। दो लोगों के निजी अनुबंध में भी दखल होता है। आर्थिक आजादी की परिकल्पना नहीं है। जब तक राजनीतिक आजादी के साथ सही अर्थों में आर्थिक स्वतंत्रता नहीं मिलेगी, स्वतंत्रता दिवस एक अधूरी आजादी का उत्सव ही माना जायेगा। भारत, इण्डिया या न्यू इण्डिया नाम रखने से कुछ नही बदलेगा।

किसी विद्वान ने लिखा है कि “व्यक्तिगत आजादी और एक न्यूनतम स्तर की आर्थिक संपन्नता तथा सामाजिक सम्मान के बीच संबंध है। बिना आजाद जिंदगी जीने की आजादी के यह सांकेतिक आजादी निरर्थक है।“ अभी भी  देश में वंचित वर्गों- कुछ धार्मिक अल्प संख्यकों, दलितों, महिलाओं, आदिवासियों आदि को मताधिकार और आजादी का तकनीकी लाभ तो हासिल है लेकिन उनके रोजमर्रा के जीवन में जो भेदभाव है वह उनकी आजादी को काफी हद तक प्रभावित करता है। जो लोग वंचित वर्ग में पैदा नहीं हुए हैं उनके लिए भी देश में व्याप्त गरीबी यही बताती है कि आबादी का एक बड़ा हिस्सा न्यूनतम संसाधनों के साथ जिंदगी बसर कर रहा है। जबकि आजादी के 70 बरस बाद तो उनको इसका पूरा लाभ मिलना चाहिए था। और इसी कारण जगमगाते शॉपिंग मॉल और स्टार्टअप की चमक के पीछे एक विशाल, भ्रमित और गरीब भारत दिखाई देता है, जिसे सरकार अब “न्यू इण्डिया” समझा रही है।

हर व्यक्ति को अपनी जिंदगी जीने के मामले में चयन की भरपूर स्वतंत्रता ही आज़ादी है  और इस चयन में सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होना चाहिए।  आजादी के लिए एक न्यूनतम स्तर की आय और व्यक्तिगत सम्मान भी नितांत आवश्यक हैं। देश के अधिकांश लोगों को यह मयस्सर नहीं है । भारत से इण्डिया और अब न्यू इण्डिया की यात्रा बिना इसके पूर्ण नहीं होगी। सरकर और नागरिकों के बीच एक सद्भाव की जरूरत है। अभी तो सिर्फ राजनीतिक स्वार्थ में लिपटे जुमलों से आज़ादी की बात होती है। जो अधूरी है, उसे हम सबको मिलकर “भारत” में बसे गरीब के हित में पूरा करना होगा।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
पूर्व में प्रकाशित लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए
आप हमें ट्विटर और फ़ेसबुक पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।

SHARE WITH YOU FRIENDS

-----------

CHOOSE YOUR FAVOURITE NEWS CATEGORY | कृपया अपनी पसंदीदा श्रेणी चुनें


Popular News This Week

खबरें जो आज भी सुर्खियों में हैं