देश की 14वें राष्ट्रपति से अपेक्षा

Friday, July 21, 2017

राकेश दुबे@प्रतिदिन। यह सही है कि 1976 में लाए गए 42वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रपति की भूमिका काफी हद तक रस्म अदायगी तक ही सीमित हो गई है, लेकिन 14वें राष्ट्रपति के मामले में इसके कुछ और अर्थ होना संभावित हैं। पहला, वे उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय में वह एक दशक से भी अधिक समय तक सरकारी वकील रह चुके हैं। इसके अलावा राज्यसभा सदस्य के रूप में अपने दो कार्यकाल और बिहार के राज्यपाल के रूप में काम करने के चलते उनके पास भारतीय लोकतंत्र की अंदरूनी कार्यप्रणाली के बारे में पर्याप्त अनुभव भी है। यह अनुभव इस पद में निहित उत्तरदायित्वों के निर्वहन के लिए काफी मजबूत स्थिति में हैं और सार्वजनिक जीवन में उनकी व्यक्तिगत या पारिवारिक ईमानदारी पर कोई आक्षेप भी नहीं है। दूसरे कारण की जड़ें इतिहास में निहित हैं। आपातकाल के बाद सभी सरकारों ने राष्ट्रपति भवन में बैठे शख्स पर साउथ ब्लॉक का वर्चस्व स्थापित करने की कोशिशें की हैं, लेकिन प्रधानमंत्री के प्रति आभारी माने जाने वाले राष्ट्रपतियों ने भी अनपेक्षित तरीकों से अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल किया है।

उदहारण हैं| तत्कालीन प्रधानमंत्री के साथ अपनी तनातनी के चरम पर होने के दौरान राष्ट्रपति जैल सिंह ने डाक विधेयक को वीटो कर दिया था। उस विधेयक से सरकार को डाक संचार को बीच में ही रोकने का अधिकार मिल जाने वाला था। उसके पहले नीलम संजीव रेड्डी ने इसकी मिसाल पेश की थी। रेड्डी ने प्रधानमंत्री पद पर नियुक्ति को कुछ शर्तों के साथ जोडऩे का काम किया था। जनता पार्टी में टूट के बाद रेड्डी ने चरण सिंह को सदन में अपना बहुमत साबित करने को कहा था। यह अलग बात है कि चरण सिंह ऐसा कर पाने में नाकाम रहे। 

देश के पहले दलित राष्ट्रपति के आर नारायणन ने भी उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार और बिहार की राबड़ी देवी सरकार की बर्खास्तगी के मौके पर राष्ट्रपति को प्राप्त शक्तियों का इस्तेमाल कर खुद को रबर-स्टांप नहीं बनने दिया था। प्रणव मुखर्जी ने भी धर्मनिरपेक्षता के राजनीतिक प्रतिवाद के तौर पर असहिष्णुता को बढ़ावा दिए जाने के खिलाफ अपनी राय सार्वजनिक कर अपने पद की सत्ता को स्थापित किया। ये सब नजीरें भारतीय लोकतंत्र में राष्ट्रपति की भूमिका की मार्गदर्शी स्तम्भ है और राष्ट्रपति की भूमिका की महत्ता गणतंत्र दिवस पर सलामी लेने और कार्यपालिका द्वारा तैयार किए गए भाषणों को संसद में पढऩे की औपचारिकता से अलग करती हैं।

इस चुनाव में दो-तिहाई मतों से मिली जीत चुनाव में क्रॉस वोटिंग की भी पुष्टि करती है, जिसका  यह भी अर्थ है कि अपने दलगत विचारों से अलग हटकर लोगों ने उनके पक्ष में मतदान किया है।  अभी, भारत के नाजुक लोकतंत्र में नियंत्रण एवं संतुलन के लिए देश के 14वें राष्ट्रपति की भूमिका महत्वपूर्ण है, कुछ ऐसा हो जिससे राष्ट्र प्रथम की भावना और मजबूत हो।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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