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जिस देश का बचपन कुपोषित हो...

Wednesday, September 28, 2016

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राकेश दुबे@प्रतिदिन। जितनी योजनाए उतना बड़ा संकट है कुपोषण। आईसीडीएस, पीडीएस, मध्याह्न भोजन योजना आदि ढेरों योजनाएं सरकार की तरफ से बनाई गई हैं, लेकिन कुपोषण एक ऐसी समस्या है, जिस पर अन्य समस्याओं, जैसे लोगों की आर्थिक स्थिति, शिक्षा, स्वच्छता, महिलाओं की सामाजिक स्थिति, स्वास्थ्य आदि सभी मामलों के साथ नए सिरे से एक ताने-बाने को बुन कर उनका समाधान निकालते हुए ही जीता जा सकता है। हमारे आंगनबाड़ी केंद्रों की जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी कहती है। हकीकत यही है कि सौ बच्चों की उपस्थिति दिखाने वाले कई केंद्रों में 20 बच्चे भी नहीं होते। सरकार पोषण पर हर साल तकरीबन आठ हजार करोड़ रुपये खर्च करती है, लेकिन इस सबके बावजूद लगभग 25 लाख बच्चे आज भी हर साल कुपोषण से अपनी जान गंवा रहे हैं।

मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में पिछले दो महीनों में 19 बच्चों की कुपोषण से मृत्यु हो चुकी है, लेकिन राज्य सरकार राहत प्रदान करना तो दूर अभी तक इसका कारण नहीं खोज सकी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन द्वारा भेजी गई दस टीमों ने यहां पांच दिनों में ही 461 कुपोषित बच्चे ढूंढ़ निकाले। प्रदेश में शिशु मृत्यु दर 51 पर है, जबकि देश के पैमाने पर यह दर 39 है। राज्य प्रशासन ने दो वर्षों में 2,503 करोड़ कुपोषण पर खर्च किए, लेकिन महिला और बाल विकास विभाग के आंकड़े बताते हैं कि प्रदेश में अब भी 13 लाख बच्चे कुपोषित हैं। प्रदेश की स्वास्थ्य प्रणाली में चाहे डॉक्टरों की भारी कमी हो या स्वास्थ्य सेवाओं-सुविधाओं की बदतर स्थिति, लोगों की परेशानियों का कोई अंत नहीं है। राज्य की आबादी के अनुपात में यहां जरूरत है सात हजार डॉक्टरों की, लेकिन उपलब्ध सिर्फ 3,000 हैं। इसी तरह, 1989 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की जगह सिर्फ 1,171 केंद्र काम कर रहे हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 कहता है कि मातृत्व और शैशवावस्था के मामले में स्वास्थ्य और पोषण कार्यक्रमों पर होने वाला निवेश दीर्घकालिक लाभ का मामला है, लेकिन हम इस मानव पूंजी का लाभ उठाने की बजाय उसे जाया किये जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार, कुपोषण के कारण भारत की जीडीपी को कम से कम दो-तीन प्रतिशत तक हानि पहुंच रही है, लेकिन क्या ये आंकड़े देश को असल में पहुंच रहे नुकसान का अनुमान लगाने के लिए पर्याप्त हैं? कुपोषण के विरुद्ध यह लड़ाई अब एक राजनीतिक मामला नहीं रह गई है, यह मानवीयता का, मानवीय संवदेना का मामला बन चुकी है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज जो बच्चे कुपोषण की बलि चढ़ रहे हैं, वही आगे चलकर देश के कामगार बनते, भविष्य बनते। इनके उत्थान, इनकी रक्षा और इनके विकास में ही देश का विकास निहित है।
श्री राकेश दुबे वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं।        
संपर्क  9425022703        
rakeshdubeyrsa@gmail.com
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