नई दिल्ली, नवंबर 2026: भारत में दवाओं की खोज, टीकों के विकास और जैव-चिकित्सा अनुसंधान (बायोमेडिकल रिसर्च) के लिए प्रयोगशालाओं में होने वाले पशु परीक्षणों के नियमों में पांच दशक बाद सबसे बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार के मत्स्यपालन, पशुपालन एवं डेयरी मंत्रालय (पशुपालन और डेयरी विभाग) ने भारत के राजपत्र में एक महत्वपूर्ण मसौदा अधिसूचना जारी की है। इसे पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026 नाम दिया गया है।
पशु क्रूरता निवारण (प्रयोगशाला पशुओं के प्रयोग, प्रजनन और व्यापार का नियंत्रण और पर्यवेक्षण) नियम, 2026
नवंबर 2026 के प्रथम सप्ताह में इस मसौदे पर आम जनता, वैज्ञानिकों, फार्मा कंपनियों और पशु कल्याण संगठनों से सुझाव व आपत्तियां दर्ज कराने की 30 दिवसीय वैधानिक अवधि समाप्त हो गई है। जहां एक ओर देश का वैज्ञानिक और फार्मास्युटिकल जगत इसे अनुसंधान की राह में लालफीताशाही खत्म करने वाला कदम बता रहा है, वहीं दूसरी ओर पशु अधिकार संगठनों ने इसके कुछ प्रावधानों (विशेषकर बड़े पशुओं पर परीक्षण की स्व-मंजूरी) को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। यह विशेष रिपोर्ट राजपत्र अधिसूचना के आधिकारिक दस्तावेजों के आधार पर इस पूरी नीति की पड़ताल करती है।
क्या कहते हैं सरकारी दस्तावेज?
इस नए नीतिगत ढांचे को समझने के लिए सबसे पहले इसके आधिकारिक और वैधानिक संदर्भ को जानना आवश्यक है। केंद्र सरकार ने पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 (1960 का 59) की धारा 15 और धारा 38 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए यह मसौदा तैयार किया है।
राजपत्र संदर्भ: भारत का राजपत्र (असाधारण), भाग II, खंड 3, उप-खंड (i)।
अधिसूचना संख्या: सा.का.नि. 864(अ) यानी G.S.R. 864(E)।
महत्वपूर्ण तिथियां: मंत्रालय स्तर पर इस अधिसूचना पर 30 सितंबर 2026 को हस्ताक्षर किए गए और इसे 6 अक्टूबर 2026 को आधिकारिक रूप से राजपत्र में प्रकाशित किया गया।
नियामक संस्था: इस पूरी व्यवस्था के संचालन की जिम्मेदारी पशुपालन और डेयरी विभाग के अधीन काम करने वाली वैधानिक संस्था पशुओं पर प्रयोगों के नियंत्रण और पर्यवेक्षण की समिति (CCSEA) की है।
अधिसूचना के प्रकाशन की तिथि से 30 दिनों के भीतर सभी हितधारकों से आपत्तियां और सुझाव मांगे गए थे। नवंबर 2026 के पहले सप्ताह में यह समय-सीमा पूरी हो चुकी है और अब मंत्रालय प्राप्त सुझावों की समीक्षा कर इन नियमों को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया में है।
पुराने 1968 और 1998 के नियमों की जगह लेगा नया कानून
भारत में प्रयोगशाला पशुओं के कल्याण और उन पर होने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों की निगरानी के लिए अब तक दो पुराने नियम लागू थे: पहला, प्रयोगशाला पशुओं पर प्रयोग नियम, 1968 और दूसरा, पशुओं के प्रजनन और प्रयोगों का नियंत्रण एवं पर्यवेक्षण नियम, 1998 (जिनमें वर्ष 2001 और 2006 में आंशिक संशोधन किए गए थे)।
पिछले दो दशकों में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग, जेनेटिक रिसर्च, वैक्सीन निर्माण और कॉन्ट्रैक्ट रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (CRO) के क्षेत्र में भारी विस्तार हुआ है। सरकार का तर्क है कि 1968 और 1998 के नियम वर्तमान दौर की वैज्ञानिक जटिलताओं और वैश्विक मानकों के अनुरूप नहीं रह गए थे। इसलिए, अलग-अलग नियमों में संशोधन करने के बजाय, सरकार ने प्रयोगशाला पशुओं के प्रजनन (Breeding), व्यापार (Trading), आयात-निर्यात और उन पर होने वाले प्रयोगों (Experiments) को एक ही एकीकृत कानून के दायरे में लाने के लिए 2026 के ये नए नियम प्रस्तावित किए हैं।
नए नियमों की मुख्य बातें: 3Rs सिद्धांत को पहली बार मिली कानूनी पहचान
G.S.R. 864(E) अधिसूचना का सबसे सकारात्मक और आधुनिक पहलू यह है कि इसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत 3Rs सिद्धांत को औपचारिक और कानूनी तौर पर भारतीय नियामक ढांचे में शामिल किया गया है। किसी भी शोध संस्थान को पशुओं पर प्रयोग करने से पहले इन तीन कसौटियों का पालन करना होगा:
Replacement: यदि किसी वैज्ञानिक प्रयोग या दवा की जांच के लिए जीवित पशु के बजाय कोई वैज्ञानिक विकल्प (जैसे कंप्यूटर मॉडलिंग, सेल कल्चर, ऑर्गन-ऑन-चिप या कृत्रिम ऊतक) उपलब्ध है, तो पशु का उपयोग नहीं किया जाएगा।
Reduction: यदि जीवित पशु पर परीक्षण करना अनिवार्य ही हो, तो सांख्यिकीय और वैज्ञानिक तरीकों को इस प्रकार उन्नत किया जाए कि कम से कम पशुओं के उपयोग से सटीक वैज्ञानिक परिणाम प्राप्त किए जा सकें।
Refinement: प्रयोग की प्रक्रिया, पशुओं के रखरखाव, बेहोशी की दवा (एनेस्थीसिया) और दर्द निवारक प्रबंधन को इतना बेहतर बनाया जाए कि पशु को प्रयोग के दौरान और उसके बाद कम से कम शारीरिक या मानसिक कष्ट हो।
प्रयोगों का 4-स्तरीय वर्गीकरण: पीड़ा के आधार पर तय होगी श्रेणी
2026 के मसौदा नियमों में पहली बार पशुओं पर होने वाले वैज्ञानिक प्रयोगों को उनसे होने वाले दर्द या तनाव की गंभीरता (Severity) के आधार पर चार स्पष्ट श्रेणियों में बांटा गया है:
Non-recovery: ऐसे प्रयोग जिनमें पशु को पूरी तरह बेहोश (जनरल एनेस्थीसिया देकर) किया जाता है और प्रयोग पूरा होने के बाद उसे होश में लाए बिना ही मानवीय तरीके से मृत्यु (इच्छामृत्यु या यूथेनेशिया) दे दी जाती है, ताकि उसे कोई दर्द महसूस न हो।
Mild: ऐसे परीक्षण जिनसे पशु को बहुत कम या अल्पकालिक दर्द या असुविधा होती है। उदाहरण के लिए, रक्त का नमूना लेना, सामान्य इंजेक्शन लगाना या गैर-आक्रामक इमेजिंग (जैसे एक्स-रे या एमआरआई) करना।
Moderate: ऐसे प्रयोग जिनमें पशु को मध्यम स्तर का दर्द या तनाव होता है, लेकिन उचित दर्द निवारक दवाओं (एनाल्जेसिक) और देखभाल से उसे नियंत्रित किया जा सकता है। इसमें सामान्य सर्जरी या कुछ दवाओं के विषाक्तता परीक्षण शामिल होते हैं।
Severe: ऐसे परीक्षण जिनमें पशु को तीव्र या लंबे समय तक रहने वाली पीड़ा, गंभीर बीमारी का संक्रमण या अंग काम न करने जैसी स्थिति का सामना करना पड़ता है।
विवाद का मुख्य केंद्र: संस्थागत स्व-मंजूरी और बड़े पशुओं का मुद्दा
जहां 3Rs सिद्धांत और गंभीरता आधारित वर्गीकरण का स्वागत किया गया है, वहीं इस अधिसूचना के एक विशेष प्रावधान ने देश भर के पशु कल्याण संगठनों और नीति विशेषज्ञों के बीच तीखी बहस छेड़ दी है। यह विवाद विकेंद्रीकृत मंजूरी (Institutional Self-Approval) से जुड़ा है।
पुराने नियमों के तहत, प्रयोगशालाओं में चूहों या खरगोश जैसे छोटे कृंतक (Rodents) पशुओं पर प्रयोग की अनुमति तो संस्थान की अपनी आंतरिक समिति दे सकती थी, लेकिन कुत्तों (विशेषकर बीगल नस्ल), बिल्लियों, बड़े फार्म पशुओं (गाय, भैंस, भेड़, बकरी) और बंदरों (Non-human primates) जैसे बड़े पशुओं पर किसी भी प्रकार के प्रयोग के लिए केंद्र सरकार की शीर्ष वैधानिक समिति (CCSEA) से सीधे तौर पर पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य था।
लेकिन 2026 के नए मसौदे के अनुसार, हर पंजीकृत शोध संस्थान में गठित संस्थागत पशु आचार समिति (Institutional Animal Ethics Committee - IAEC) को यह अधिकार दिया जा रहा है कि वह न केवल छोटे पशुओं, बल्कि बड़े पशुओं (कुत्ते, बिल्ली, फार्म पशु और बंदर) पर भी होने वाले हल्के (Mild) और मध्यम (Moderate) श्रेणी के प्रयोगों को खुद ही मंजूरी दे सकेगी। केंद्रीय समिति (CCSEA) के पास केवल गंभीर (Severe) श्रेणी के प्रयोगों की फाइलें ही मंजूरी के लिए भेजी जाएंगी।
पशु अधिकार संगठनों की चिंताएं: हितों का टकराव और आवारा पशुओं का जोखिम
पेटा इंडिया (PETA India), पीपल फॉर एनिमल्स (PFA) और अन्य पशु कल्याण संगठनों ने मंत्रालय को भेजे गए अपने आधिकारिक सुझावों में इस मसौदे की कई खामियों की ओर ध्यान दिलाया है:
Conflict of Interest: संस्थागत पशु आचार समिति (IAEC) के अधिकांश सदस्य उसी संस्थान के वैज्ञानिक या कर्मचारी होते हैं जहां प्रयोग होना है। यद्यपि इसमें CCSEA का एक नामित प्रतिनिधि होता है, फिर भी आंतरिक दबाव के कारण प्रयोगों की निष्पक्ष जांच प्रभावित होने की आशंका रहती है। आलोचकों का तर्क है कि केंद्रीय निगरानी से बचने के लिए प्रयोगशालाएं किसी गंभीर (Severe) स्तर के दर्दनाक प्रयोग को कागजों में मध्यम (Moderate) श्रेणी का दिखाकर अपनी ही आंतरिक समिति से तुरंत मंजूरी ले सकती हैं।
मसौदे में विशेष परिस्थितियों में गैर-पंजीकृत स्रोतों या खुले में पाए जाने वाले पशुओं (Feral/Stray animals) के शोध में उपयोग को लेकर जो छूट की भाषा रखी गई है, उस पर भी कड़ी आपत्ति जताई गई है। कार्यकर्ताओं को डर है कि इससे सड़कों से आवारा कुत्तों और बिल्लियों को पकड़कर अवैध रूप से प्रयोगशालाओं में पहुंचाने का रास्ता खुल सकता है।
पारदर्शिता की कमी: जब बड़े पशुओं के परीक्षणों की फाइलें केंद्रीय स्तर पर दिल्ली नहीं आएंगी, तो देश में कुल कितने कुत्तों या बंदरों पर किस तरह के प्रयोग हो रहे हैं, इसका केंद्रीकृत और पारदर्शी डेटाबेस बनाए रखना कठिन हो जाएगा।
वैज्ञानिकों और फार्मा जगत का पक्ष
दूसरी तरफ, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) से जुड़े पूर्व वैज्ञानिकों, विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं और भारतीय फार्मास्युटिकल उद्योग का दृष्टिकोण इससे बिल्कुल अलग है। उनका कहना है कि भारत दुनिया की फार्मेसी कहलाता है, लेकिन अब हमें केवल जेनेरिक दवाएं बनाने से आगे बढ़कर नई दवाओं और टीकों की खोज (New Drug Discovery) में आत्मनिर्भर बनना होगा।
वैज्ञानिकों के अनुसार, पहले किसी जीवनरक्षक दवा या टीके के सामान्य परीक्षण के लिए भी केंद्रीय समिति (CCSEA) से अनुमति लेने में महीनों और कभी-कभी एक साल तक का समय लग जाता था। समय पर मंजूरी न मिलने से कई महत्वपूर्ण शोध परियोजनाएं अधर में लटक जाती थीं।
अमेरिका, यूरोपीय संघ और जापान जैसे देशों में भी संस्थागत समितियों (IACUC) को स्तर-आधारित मंजूरी के अधिकार प्राप्त हैं, बशर्ते वहां ऑडिट और निरीक्षण की व्यवस्था सख्त हो।
वैज्ञानिक समुदाय का यह भी कहना है कि IAEC कोई मनमानी करने वाली निजी समिति नहीं है। इसमें केंद्र सरकार (CCSEA) द्वारा नियुक्त मुख्य नामित सदस्य, एक बाहरी वैज्ञानिक और एक समाजसेवी या पशु कल्याण प्रतिनिधि का होना अनिवार्य होता है। बिना सरकारी प्रतिनिधि की सहमति के कोई भी प्रस्ताव पास नहीं हो सकता।
नीति विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि सरकार संस्थागत समितियों (IAEC) को बड़े पशुओं पर मध्यम स्तर के प्रयोगों की अनुमति देने का अधिकार देती भी है, तो उसके साथ तीन सुरक्षा कवच अनिवार्य रूप से जोड़े जाने चाहिए: पहला, सभी मंजूरियों का ब्योरा रियल-टाइम ऑनलाइन पोर्टल पर सार्वजनिक हो; दूसरा, बिना पूर्व सूचना के औचक निरीक्षण (Surprise Inspections) की व्यवस्था हो; और तीसरा, आवारा पशुओं के प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल पर पूर्ण और स्पष्ट प्रतिबंध लगाया जाए। जब तक अंतिम राजपत्र अधिसूचना जारी नहीं हो जाती, तब तक देश के वैज्ञानिक और पशु कल्याण जगत की निगाहें केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी रहेंगी।

