भोपाल समाचार, 31 अक्टूबर 2026: अपने स्थापना के सौ वर्ष पूरे कर चुके राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) में अब तक के सबसे बड़े संगठनात्मक बदलाव की जमीन तैयार हो चुकी है। मध्य प्रदेश की आर्थिक राजधानी इंदौर के ऐतिहासिक डेली कॉलेज परिसर में 2 से 4 नवंबर के बीच आयोजित हो रही संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की तीन दिवसीय बैठक में इन बदलावों पर अंतिम मुहर लगने जा रही है।
संघ नई कार्यप्रणाली लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है
बैठक शुरू होने से ठीक पहले संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने एक महत्वपूर्ण पत्रकार वार्ता में स्पष्ट कर दिया है कि देश भर में एक लाख से अधिक दैनिक शाखाएं संचालित करने के बावजूद संघ को कानूनी तौर पर पंजीकृत (रजिस्टर) कराने का फिलहाल कोई प्रस्ताव या विचार नहीं है। इसके साथ ही संघ अपनी दशकों पुरानी प्रांत आधारित व्यवस्था में बदलाव कर प्रशासनिक संभागों (कमिश्नरी) और छोटे जिलों के आधार पर नई कार्यप्रणाली लागू करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
जिलों की संख्या बढ़ाकर 1500 से 1600 करने का विचार
26 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इंदौर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक आयोजित हो रही है। इसमें सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत और सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले सहित देश भर के 11 क्षेत्रों और 46 प्रांतों से चुने गए 408 शीर्ष पदाधिकारी शामिल हो रहे हैं। संघ अपने शताब्दी वर्ष के कार्यों की समीक्षा करते हुए अपनी भौगोलिक और प्रशासनिक संरचना को पूरी तरह नया रूप दे रहा है। संगठन की दृष्टि से मौजूदा 924 जिलों की संख्या बढ़ाकर 1500 से 1600 करने और प्रांत प्रचारक व्यवस्था की जगह संभागीय स्तर पर जिम्मेदारी तय करने की योजना है।
संघ की व्यवस्था में बदलाव क्यों जरूरी है
संघ ने अपने शताब्दी वर्ष के तहत समाज में पंच परिवर्तन (सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी जीवनशैली और नागरिक कर्तव्य) को घर-घर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है। संगठन का ढांचा जितना छोटा और विकेंद्रीकृत होगा, शहरों के मोहल्लों से लेकर दूरदराज के ग्रामीण मंडलों और नई पीढ़ी (जेन-जी) तक इसके सामाजिक अभियानों का सीधा असर उतना ही गहरा होगा।
RSS संगठन नहीं बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक परिवार
RSS का विधिवत रजिस्ट्रेशन क्यों नहीं, इसके उत्तर में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में विजयादशमी के दिन डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने एक सांस्कृतिक और सामाजिक परिवार के रूप में की थी, न कि किसी कॉरपोरेट संस्था या सरकारी अनुदान प्राप्त करने वाले एनजीओ के रूप में। संघ का मानना रहा है कि वह समाज के भीतर अनौपचारिक और स्वैच्छिक अनुशासन से चलने वाली एक सतत प्रक्रिया है, जिसके खर्चों का संचालन स्वयंसेवकों द्वारा वर्ष में एक बार दिए जाने वाले गुरुदक्षिणा समर्पण से होता है। आरएसएस खुद को एक पंजीकृत दफ्तर के बजाय समाज का एक सांस्कृतिक परिवार मानता है, हालांकि उससे जुड़े सेवा प्रकल्प, विद्यालय (विद्या भारती) या चिकित्सालय अपने-अपने स्तर पर आवश्यकतानुसार कानूनी रूप से पंजीकृत ट्रस्ट या सोसायटी के रूप में ही कार्य करते हैं।
संगठनात्मक ढांचे में ऐतिहासिक बदलाव: प्रांत से संभाग की ओर कदम
इंदौर बैठक का सबसे बड़ा और दूरगामी एजेंडा संघ की संगठनात्मक संरचना में किया जा रहा बदलाव है। अब तक संघ का कामकाज देश को 11 क्षेत्रों और 46 प्रांतों में बांटकर संचालित किया जाता रहा है। उदाहरण के लिए, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को मिलाकर एक क्षेत्र (मध्य क्षेत्र) माना जाता है, जिसके भीतर मध्य भारत, मालवा, महाकौशल और छत्तीसगढ़ जैसे संगठनात्मक प्रांत आते हैं।
लेकिन पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या बढ़ने और शाखाओं के व्यापक विस्तार के कारण एक प्रांत का भौगोलिक आकार इतना बड़ा हो गया है कि एक प्रांत प्रचारक या प्रांत कार्यवाह के लिए हर जिले और बस्ती की नियमित निगरानी करना व्यावहारिक रूप से कठिन होता जा रहा था। इसलिए इंदौर बैठक में जिस नई रूपरेखा पर मंथन हो रहा है, उसके मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- अब प्रांत के बजाय राज्य सरकारों की प्रशासनिक कमिश्नरी यानी संभाग (डिवीजन) स्तर पर संगठनात्मक इकाइयों को अधिक अधिकार और स्वायत्तता देने की तैयारी है।
- दशकों पुरानी प्रांत प्रचारक केंद्रित व्यवस्था में बदलाव कर संभागीय प्रचारक और संभागीय कार्यवाह की भूमिका को निर्णायक बनाया जाएगा, ताकि निर्णय लेने की प्रक्रिया तेज हो सके।
- वर्तमान में संघ की संगठनात्मक दृष्टि से देश में लगभग 924 जिले हैं। नई योजना के तहत इन जिलों की संख्या बढ़ाकर 1500 से 1600 के बीच की जा रही है।
- शहरी क्षेत्रों में बस्तियों और ग्रामीण क्षेत्रों में मंडलों (कुछ गांवों का समूह) की सीमाओं को छोटा किया जा रहा है, ताकि हर इकाई में दैनिक शाखा और साप्ताहिक मिलन का संचालन सुगमता से हो सके।
Gen-Z और डिजिटल युग के युवाओं पर विशेष फोकस
इस बार की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक की एक और खास बात यह है कि इसमें आधुनिक तकनीक और युवा पीढ़ी यानी जेन-जी (Gen-Z) की बदलती सोच पर गंभीरता से चर्चा हो रही है। सुनील आंबेकर ने बताया कि आज का युवा राष्ट्र निर्माण, पर्यावरण, स्टार्टअप और भारतीय संस्कृति से जुड़ना चाहता है, लेकिन उसके संवाद की भाषा और माध्यम बदल चुके हैं।
संघ के प्रचार विभाग और बौद्धिक प्रकोष्ठ द्वारा इस बात पर रणनीति बनाई जा रही है कि डिजिटल कंटेंट, सोशल मीडिया, पॉडकास्ट और संवादात्मक कार्यक्रमों के जरिए कॉलेज के छात्रों और आईटी सेक्टर में काम करने वाले युवाओं को संगठन की विचारधारा से कैसे जोड़ा जाए। पिछले एक वर्ष में संघ की आधिकारिक वेबसाइट पर जॉइन आरएसएस (Join RSS) माध्यम से जुड़ने वाले युवाओं की संख्या में भारी वृद्धि दर्ज की गई है, जिनमें बड़ी संख्या 18 से 30 वर्ष के युवाओं की है।
इंदौर ही क्यों चुना गया बैठक का केंद्र?
राजनीतिक और सामाजिक विश्लेषकों की नजर इस बात पर भी है कि संघ ने इस ऐतिहासिक बैठक के लिए इंदौर को ही क्यों चुना। मध्य प्रदेश का मालवा अंचल और विशेष रूप से इंदौर लंबे समय से संघ की गतिविधियों का अत्यंत मजबूत गढ़ रहा है। इससे पहले वर्ष 1999-2000 के आसपास इंदौर में इस स्तर की राष्ट्रीय बैठक हुई थी। 26 साल बाद जब संघ अपने सौ साल पूरे कर अगले सौ वर्षों की रूपरेखा तय कर रहा है, तब देश के सबसे स्वच्छ शहर और मध्य भारत के केंद्र इंदौर को चुनकर कार्यकर्ताओं में नया उत्साह भरने का प्रयास किया गया है।
बैठक के दौरान डेली कॉलेज परिसर में सुरक्षा और गोपनीयता के कड़े इंतजाम किए गए हैं। इस बैठक में किसी भी बाहरी व्यक्ति या आम जनता के लिए प्रवेश या पंजीकरण की व्यवस्था नहीं है; केवल अपेक्षित 408 अखिल भारतीय और प्रांतीय स्तर के पदाधिकारी ही इसमें भाग ले रहे हैं।

