भोपाल, 12 अक्टूबर 2026: रातीबड़ स्थित शासकीय श्रमोदय आवासीय विद्यालय में बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया। 13 विद्यार्थियों की तबीयत खराब हुई और वह अस्पताल में भर्ती हैं लेकिन समाचार के लिखे जाने तक किसी ने कोई कार्रवाई नहीं की। प्रिंसिपल ने कैंटीन संचालक को नोटिस दिया है, पुलिस जांच कर रही है और कलेक्टर की टीम अब तक स्कूल में नहीं पहुंची है। जबकि अब तक मुकदमा दर्ज हो जाना चाहिए था, कैंटीन संचालक को हिरासत में ले लिया जाना चाहिए था। वर्तमान में जो स्थिति बनी है उसके हिसाब से प्रिंसिपल के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज होना चाहिए। किन धाराओं में मामला दर्ज होगा बताए देते हैं:-
सबसे पहले जानिए कि मामला क्या है
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के रातीबड़ स्थित शासकीय श्रमोदय आवासीय विद्यालय में बच्चों को परोसी गई आलू की सब्जी में छिपकली मिलने का मामला सामने आया है। सब्जी खाने के बाद 13 बच्चों की तबीयत बिगड़ गई। बीमार होने वाले बच्चे कक्षा छठवीं से नौवीं तक के हैं। बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत होने पर रविवार को जयप्रकाश (जेपी) अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों के अनुसार, अभी किसी की जान को खतरा नहीं है परंतु सभी बच्चों को ऑब्जर्वेशन में रखा गया है मतलब बच्चे खतरे से बाहर भी नहीं हैं। यह बच्चों की इम्युनिटी पर डिपेंड करता है। यदि बच्चों की इम्युनिटी अच्छी होगी, तो उनको अगले 24 घंटे में डिस्चार्ज मिल जाएगा, नहीं तो किसी की जान को खतरा भी हो सकता है। खाने का मतलब यह है कि यदि बच्चे स्वस्थ हो जाते हैं तो इसका मतलब यह नहीं है कि सब्जी स्वास्थ्य के लिए खतरनाक नहीं थी, और जान का खतरा नहीं था।
प्रिंसिपल द्वारा कैंटीन संचालक को बचाने की कोशिश
विद्यालय की प्रिंसिपल रत्ना दुबे ने बताया कि कैंटीन संचालक की गलती के कारण बच्चों को छिपकली वाली सब्जी परोसी गई। घटना में 13 बच्चों की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें जेपी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। मामले को गंभीरता से लेते हुए कैंटीन संचालक को नोटिस जारी किया गया है। सवाल यह है कि नोटिस जारी करके प्रिंसिपल क्या कार्रवाई करेंगे। उनके पास अधिकार ही क्या है। यह उपेक्षा द्वारा मानव जीवन या वैयक्तिक सुरक्षा को खतरे में डालने का अपराध है। पुलिस थाने में मामला दर्ज करवाना चाहिए था। ऐसा नहीं करके प्रिंसिपल ने, अपराधी को संरक्षण देने का काम किया है, जो अपने आप में एक अपराध है। इसके आधार पर प्रिंसिपल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
थाना प्रभारी रामबाबू सिंह का बयान
रातीबड़ थाना प्रभारी रामबाबू सिंह ने बताया कि परिजनों की ओर से शिकायत दर्ज कराई गई है। शिकायत में बच्चों को छिपकली वाली सब्जी परोसे जाने की बात कही गई है। पुलिस मामले की जांच कर रही है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर कैंटीन संचालक के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
रामबाबू सिंह को थाने से वापस बुलाना चाहिए
इस मामले में पीड़ित बच्चों की उम्र 18 वर्ष से कम है। भारतीय न्याय संहिता के अनुसार यह सभी बच्चे "बालक" की श्रेणी में आते हैं, और बालकों के खिलाफ अपराध की सूचना मिलते ही मामला दर्ज करना थाना प्रभारी का संवैधानिक दायित्व है। श्री रामबाबू सिंह ने अपने निर्धारित दायित्व का पालन नहीं किया। मामला दर्ज करने से पहले शिकायत की जांच करने का इस प्रकार के मामलों में प्रावधान ही नहीं है। मामला दर्ज होने के बाद जांच होनी चाहिए। जो पुलिस अधिकारी अपने निर्धारित दायित्व का पालन नहीं करता है, ऐसे अधिकारी को निर्णायक पद पर नहीं होना चाहिए। किसी योग्य वरिष्ठ अधिकारी के अधीन केवल आदेश पालन हेतु नियुक्त किया जाना चाहिए।
किन धाराओं के तहत मामला दर्ज होना चाहिए
BNS धारा 274 (खाद्य या पेय वस्तु का अपमिश्रण): परोसने के उद्देश्य से तैयार खाद्य पदार्थ में छिपकली जैसा कोई जहरीला या अशुद्ध जीव गिरता है और वह भोजन अस्वास्थ्यकर/हानिकारक बन जाता है, तो यह धारा लागू होती है। सजा: 6 महीने तक का कारावास, या जुर्माना, या दोनों।
BNS धारा 275 (हानिकारक खाद्य या पेय का विक्रय/परोसना): यह जानते हुए या उपेक्षा बरतते हुए कि भोजन दूषित या हानिकारक स्थिति में है, उसे बच्चों को परोसना इस धारा के तहत दंडनीय अपराध है।
सजा: 6 महीने तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों।
BNS धारा 125 (उपेक्षा द्वारा मानव जीवन या वैयक्तिक सुरक्षा को खतरे में डालना): कैंटीन संचालक या कर्मचारियों की गंभीर लापरवाही और उतावलेपन के कारण यदि बच्चों के जीवन को संकट में डाला गया है।
सजा: 3 महीने तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों।
BNS धारा 125(क) (उपेक्षा द्वारा उपहति काररत करना): विषैला भोजन खाने के कारण किसी बच्चे की तबीयत खराब होती है या उसे कोई शारीरिक क्षति/उल्टी/बीमारी होती है, तो उपहति (Hurt) काररत करने की धारा लागू होगी।
BNS धारा 286 (विषैले/हानिकारक पदार्थ के संबंध में उपेक्षापूर्ण व्यवहार): विषैले/हानिकारक तत्व (छिपकली के जहर) वाले भोजन के रखरखाव और वितरण में लापरवाही बरतने पर यह धारा लगाई जाती है।
खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम, 2006 की धारा 59(ii) या 59(iii): असुरक्षित भोजन से गैर-गंभीर या गंभीर चोट होने के आधार पर क्रमशः एक वर्ष तक की कैद और ₹3 लाख तक जुर्माना, अथवा छह वर्ष तक की कैद और ₹5 लाख तक जुर्माना।
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम (Consumer Protection Act): असुरक्षित व हानिकारक भोजन की आपूर्ति को "सेवा में गंभीर कमी" (Deficiency in Service) माना जाता है, जिसके लिए पीड़ित बच्चे/अभिभावक मुआवजा (Compensation) मांग सकते हैं। हेल्थ रिकवरी के लिए जितना भी पैसा खर्च होता है वह सब मुआवजे के रूप में प्राप्त होना चाहिए।
जेपी अस्पताल में डॉक्टरों की निगरानी में बच्चे
जेपी अस्पताल के ड्यूटी डॉक्टर रत्नेश जैन के मुताबिक, श्रमोदय विद्यालय के बच्चों को उल्टी-दस्त की शिकायत के बाद अस्पताल लाया गया था। डॉक्टरों की टीम ने तत्काल उनका उपचार शुरू किया। फिलहाल सभी बच्चों की स्थिति सामान्य है और उन्हें डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है।

