नागदोष शांति का दुर्लभ महासंयोग: 15 सितंबर को चतुर्थी-युक्त पंचमी, मंगलवार, स्वाति नक्षत्र और राहुकाल का असाधारण संगम

Updesh Awasthee
धर्म एवं ज्योतिष न्यूज डेस्क, 11 सितंबर 2026:
भारतीय ज्योतिष और धर्मशास्त्र में तिथियों, नक्षत्रों और मुहुर्तो का ऐसा विशिष्ट मिलन कम ही देखने को मिलता है, जो किसी गंभीर ग्रह-दोष की निवृत्ति के लिए अचूक माना गया हो। 15 सितंबर को ऐसा ही एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिदायी संयोग निर्मित हो रहा है। 'निर्णयसिंधु' के शास्त्रीय विधानों और दक्षिण भारतीय मुहूर्त परंपरा का यह अनूठा संगम कालसर्प दोष, राहु-केतु जनित बाधाओं और नागदोष से मुक्ति पाने के लिए एक स्वर्णिम अवसर लेकर आ रहा है। 

शास्त्रों की दृष्टि में 'चतुर्थी-युक्त पंचमी' का महत्व

'निर्णयसिंधु' ग्रंथ के अनुसार, जब पंचमी तिथि चतुर्थी से युक्त होती है, तो इसे अत्यंत शुभ 'नागचतुर्थी' योग माना जाता है। ग्रंथ में स्पष्ट उल्लेख आता है:
"तस्यां तु तुष्टिता नागा इतरासु चतुथिका"
अर्थात् श्रावण शुक्ल पंचमी को छोड़कर अन्य अवसरों पर नागदेवता उसी पंचमी तिथि में सर्वधिक प्रसन्न होते हैं जो चतुर्थी से युक्त हो। महर्षि देवल के अनुसार, इस विशेष योग में नागों का पूजन व दुग्धाभिषेक करने से जातक को सर्प-भय से मुक्ति मिलती है और जीवन में व्याप्त समस्त विषैले प्रभावों (मानसिक तनाव, गुप्त शत्रु और नकारात्मक ऊर्जा) का शमन होता है।
दक्षिण भारतीय परंपरा:
सामान्यतः राहुकाल को किसी भी नए या शुभ कार्य के आरंभ के लिए वर्जित माना गया है, परंतु तंत्र व दक्षिण भारतीय मुहूर्त परंपरा का एक मूलभूत नियम है—'समान से समान की शांति'।
जिस प्रकार विष के प्रभाव को काटने के लिए विषरोधी औषधि ही कार्य आती है, ठीक उसी प्रकार जिस समय राहु की ऊर्जा अपने चरम पर होती है, उसी समय की गई राहु और नागदेव की उपासना शीघ्र फलदायी होती है। इसीलिए राहु-दोष मुक्ति, सर्पदोष निवारण और साधना के लिए राहुकाल को ही सबसे अधिक प्रभावशाली और शक्तिशाली समय माना गया है।

15 सितंबर: क्यों खास है यह 35 मिनट की समयावधि?

15 सितंबर (मंगलवार) के दिन एक साथ कई दिव्य योग बन रहे हैं:
• तिथि: चतुर्थी-युक्त पंचमी (नागचतुर्थी का शुभ योग)
• दिवस: मंगलवार (मंगल और राहु के संयोजन से निर्मित अंगारक प्रभाव की शांति का दिन)
• नक्षत्र: स्वाति नक्षत्र (राहु का स्वयं का नक्षत्र)
• समय: दोपहर बाद 3:45 से शाम 5:25 बजे तक राहुकाल
विशेषकर दोपहर 3:45 से 4:20 बजे तक का लगभग 35 मिनट का समय एक अद्वितीय 'कॉस्मिक विंडो' निर्मित कर रहा है। इस दौरान राहुकाल, राहु का स्वाति नक्षत्र, चतुर्थी-युक्त पंचमी तिथि और गोधूलि काल की निकटता—ये सभी घटक एक साथ सक्रिय रहेंगे। नागदोष और राहु-बाधा की शांति के लिए ऐसा दुर्लभ संयोग वर्षों में एक बार आता है।

इस महासंयोग में किए जाने वाले अचूक उपाय

यदि आपकी कुंडली में कालसर्प दोष, मानसिक अशान्ति, करियर में अकारण रुकावटें, अथवा विवाह में विलंब जैसी समस्याएँ हैं, तो इस 35 मिनट की विशेष समयावधि (3:45 से 4:20 PM) में निम्नलिखित सरल उपाय अवश्य करें:
• दूध व जल से शिव-नाग पूजन: शिवलिंग या नाग प्रतिमा पर तांबे/चांदी के पात्र से दूध और जल अर्पित करें। 'ॐ नमः शिवाय' अथवा 'ॐ रा हवे नमः' का जप करें।
• नींबू का दीपक (Nimbu Deepam): दक्षिण भारतीय शिव व देवी मंदिरों की परंपरा के अनुसार, नींबू को दो भागों में काटकर, उसका गुदा निकालकर उसे उल्टा करें। उसमें तिल का तेल या घी भरकर दीपक जलाएं। नींबू नकारात्मक ऊर्जा और राहु के क्रूर प्रभाव को सोखने का कार्य करता है।
• राहु मंत्र व सर्प सूक्त का पाठ: इस दौरान नवनाग स्तोत्र या राहु के बीज मंत्र का एकाग्रचित्त होकर पाठ करें।
• ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः॥​ का जाप करें 
• दिशा: जप के समय दिशा पूर्व या उत्तर-पूर्व की ओर होनी चाहिए।

• नवनाग स्तोत्रम् (मूल पाठ)
​अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलम्।
शङ्खपालं धृतराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा॥
एतानि नव नामानि नागानां च महात्मनाम्।
सायङ्काले पठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः॥
तस्य विषभयं नास्ति सर्वत्र विजयी भवेत्॥

कालसर्प दोष,पितृ दोष शमनार्थ सर्पसूक्त
श्रीगणेशाय नमः 
ब्रह्म लोकेषु ये सर्पा शेषनाग परोगमाः 
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।१।

इन्द्र लोकेषु ये सर्पाः वासु‍कि प्रमुखाद्यः ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।२।

कद्रवेयश्च ये सर्पाः मातृभक्ति परायणा ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।३।

इन्द्र लोकेषु ये सर्पाः तक्षका प्रमुखाद्य ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।४।

सत्य लोकेषु ये सर्पाः वासुकिना च रक्षिता ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।५।

मलये चैव ये सर्पाः कर्कोटक प्रमुखाद्य:।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।६।

पृथिव्यां चैव ये सर्पाः
साकेत पुर वासिता ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।७।

सर्व ग्रामेषु ये सर्पाः वसंतिषु संच्छिता।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।८।

ग्रामे वा यदि वारण्ये ये सर्पप्रचरन्ति ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।९।

समुद्र तीरे ये सर्पाये सर्पा जंलवासिनः ।
नमोस्तु-तेभ्यः सर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा ।१०।

रसातलेषु ये सर्पाः अनन्तादि महाबलाः । 
नमोस्तु-तेभ्यःसर्पेभ्यः सुप्रीतो मम सर्वदा।११।
॥ इति श्री सर्प सूक्तम् स्तोत्र ॥

• इन श्लोकों के नियमित पाठ से कालसर्प दोष, राहु-केतु जनित बाधाएँ और नागदोष समाप्त होते हैं।
• जीवन में अप्रत्याशित भय, मानसिक तनाव और विषैले जीवों के भय से मुक्ति मिलती है।
शास्त्र और खगोलीय ऊर्जाओं का यह संगम केवल एक तिथीय संयोग नहीं, बल्कि जीवन की अदृश्य रुकावटों से पार पाने का एक आध्यात्मिक मार्ग है। स्थानीय पंचांग के अनुसार मध्याह्न व्यापिनी तिथि की पुष्टि कर इस अत्यंत दुर्लभ समय का लाभ उठाएं। 
प्रस्तुति: श्री गीतांजलि ज्योतिष केंद्र, इंदौर।

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