MPPWD के प्रमुख सचिव को कोर्ट में हाजिर होना होगा, हाई कोर्ट द्वारा रिट अपील खारिज

Updesh Awasthee
भोपाल समाचार, 11 सितंबर 2026:
मध्य प्रदेश शासन, लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव श्री सुखबीर सिंह (IAS, 1997 बैच) को हाई कोर्ट ने अवमानना के मामले में कोर्ट में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने का आदेश क्या दिया, न्यायालय के समक्ष एक नया विवाद उपस्थित हो गया। मध्य प्रदेश शासन की ओर से हाई कोर्ट के आदेश को रद्द करने के लिए रिट अपील दाखिल कर दी गई। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनिंद्र कुमार सिंह की युगल पीठ के समक्ष लंबी बहस हुई और लैंडमार्क जजमेंट प्रस्तुत किए गए। अंत में माननीय न्यायालय ने स्पष्ट किया कि इस प्रकार की उपस्थिति आदेश को निरस्त नहीं किया जाता है। निष्कर्ष: सिंह साहब को हाई कोर्ट में उपस्थित होना होगा। 

मामले की पृष्ठभूमि 

यह पूरा कानूनी विवाद अवमानना याचिका (CONC No. 3772 of 2025) में एकल पीठ द्वारा पारित आदेश दिनांक 25 अगस्त 2026 (अनुलग्नक ए-1) से शुरू हुआ था। एकल पीठ ने अपने इस आदेश के माध्यम से राज्य सरकार के लोक निर्माण विभाग (PWD) के प्रमुख सचिव को आदेश दिया था की अगली सुनवाई के समय वह व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित रहेंगे। राज्य सरकार ने इस निर्देश और मामले की अत्यधिक तात्कालिकता का हवाला देते हुए युगल पीठ के समक्ष रिट अपील दायर कर इसे चुनौती दी थी। 

राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता की दलीलें 

राज्य सरकार और अन्य अपीलकर्ताओं की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (Additional Advocate General) श्री एच. एस. रूपराह, जिन्हें शासकीय अधिवक्ता (Government Advocate) श्री मानसमुनि वर्मा ने सहयोग प्रदान किया, ने अदालत में तर्क प्रस्तुत किए। अतिरिक्त महाधिवक्ता ने मामले में भारी तात्कालिकता (great urgency) बताते हुए समवर्ती पीठ (Co-ordinate Bench) के निर्णय 'श्री ज्ञानेंद्र पांडे बनाम तुलसीदास पांडे' (रिट अपील संख्या 2254 वर्ष 2025, निर्णय तिथि 08.08.2025) पर भरोसा जताया। उन्होंने तर्क दिया कि समवर्ती पीठ ने रजिस्ट्रार की आपत्ति को खारिज करते हुए रिट अपील को स्वीकार्य माना था, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक निर्णय 'मिदनापुर पीपुल्स कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड' का समर्थन लिया गया था। 

प्रतिवादी के अधिवक्ता की प्रारंभिक आपत्ति 

दूसरी ओर, प्रतिवादी अजय कुमार श्रीवास्तव की ओर से उपस्थित अधिवक्ता श्री मनोज कुमार चंसोरिया ने नोटिस स्वीकार करते हुए याचिका की पोषणीयता (maintainability) पर कड़ा प्रारंभिक विरोध दर्ज कराया। प्रतिवादी के वकील ने जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय (जम्मू पीठ) के एक निर्णय 'कमिश्नर सेक्रेटरी टू गवर्नमेंट, रूरल डेवलपमेंट एंड पीआर बनाम रियाज अहमद' (LPA No. 36 of 2024, निर्णय तिथि 11.11.2025) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि अवमानना अधिनियम की धारा 19 के तहत अपील का अधिकार केवल तभी उत्पन्न होता है जब अदालत अवमाननाकर्ता को दंडित करने या सजा सुनाने का आदेश देती है। 

अवमानना न्यायालय अधिनियम 1971 की धारा 19 के कानूनी प्रावधान और अपील की प्रक्रिया

मामले की सुनवाई के दौरान अवमानना न्यायालय अधिनियम (Contempt of Courts Act) की धारा 19 के कानूनी प्रावधानों पर विस्तार से चर्चा की गई। धारा 19(1) के अनुसार, उच्च न्यायालय द्वारा अवमानना के लिए दंडित करने के क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते हुए दिए गए किसी आदेश या निर्णय के खिलाफ ही अपील दायर की जा सकती है। धारा 19(1)(a) के तहत यदि आदेश एकल पीठ का है तो अपील कम से कम दो जजों की पीठ (Division Bench) के समक्ष होगी, और धारा 19(1)(b) के तहत यदि आदेश पीठ का है तो अपील सर्वोच्च न्यायालय में होगी। इसके अलावा धारा 19(4) में अपील दायर करने की समय-सीमा निर्धारित है, जिसके अनुसार उच्च न्यायालय की पीठ में 30 दिनों के भीतर और सर्वोच्च न्यायालय में 60 दिनों के भीतर अपील दायर की जानी चाहिए। 

सर्वोच्च न्यायालय का लैंडमार्क निर्णय: मिदनापुर पीपुल्स कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम चुन्नीलाल नंदा

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा 'मिदनापुर पीपुल्स कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम चुन्नीलाल नंदा एवं अन्य' [(2006) 5 SCC 399] में दिए गए लैंडमार्क सिद्धांतों का विस्तार से उल्लेख किया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने अवमानना कार्यवाहियों में अपील की पोषणीयता पर निम्नलिखित सिद्धांत तय किए थे:
धारा 19 के तहत अपील केवल तभी पोषणीय है जब आदेश अवमानना के लिए सजा सुनाने या दंडित करने के क्षेत्राधिकार में पारित किया गया हो।
अवमानना कार्यवाही शुरू करने से इनकार करने, कार्यवाही शुरू करने, कार्यवाही समाप्त करने या आरोपी को बरी करने का आदेश धारा 19 के तहत अपील योग्य नहीं होता (विशेष परिस्थितियों में इसे संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत चुनौती दी जा सकती है)।
अवमानना कार्यवाही में केवल यह तय किया जाता है कि अवमानना हुई है या नहीं और उसकी सजा क्या हो; इसमें पक्षकारों के मुख्य विवाद के गुणों (merits) पर निर्णय देना उचित नहीं है।
विवाद के गुणों पर दिया गया कोई निर्देश अवमानना के क्षेत्राधिकार के तहत नहीं आता, जब तक कि वह सजा के आदेश से अटूट रूप से जुड़ा न हो।
यदि अवमानना अदालत विवाद के मुख्य गुणों पर कोई निर्णय देती है तो पीड़ित पक्ष अंतर-अदालत अपील (intra-court appeal) या अनुच्छेद 136 के तहत विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर कर सकता है।

डी. एन. तनेजा बनाम भजन लाल का सिद्धांत: अपील का अधिकार कानून द्वारा प्रदत्त अधिकार है

उच्च न्यायालय ने सर्वोच्च न्यायालय की तीन जजों की पीठ द्वारा 'डी. एन. तनेजा बनाम भजन लाल' [(1988) 3 SCC 26] में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का संदर्भ दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अपील का अधिकार केवल वैधानिक प्रावधानों (statutory provisions) पर निर्भर करता है। अदालत ने टिप्पणी की थी कि अवमानना मामला मूलतः अदालत और अवमाननाकर्ता के बीच का विषय होता है; शिकायतकर्ता केवल तथ्य अदालत के ध्यान में लाता है। धारा 19(1) के तहत पीड़ित पक्ष केवल वही अवमाननाकर्ता हो सकता है जिसे अवमानना के लिए दंडित किया गया हो। 

लेटर्स पेटेंट क्लॉज 12, संविधान के अनुच्छेद 215 और 'फैसले' (Judgment) की कानूनी व्याख्या

फैसले में जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख उच्च न्यायालय द्वारा 'स्टेट ऑफ जेएंडके बनाम मोहम्मद तय्यूब लहरवाल' (2018) और 'केंद्र शासित प्रदेश जेएंडके बनाम शहनाजा परवीन' (2021) में दिए गए निर्णयों का भी संदर्भ शामिल किया गया। इन मामलों में जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 94 (जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 215 के समरूप है) और लेटर्स पेटेंट के क्लॉज 12 (Clause 12 of Letters Patent) के तहत अपीलीय क्षेत्राधिकार की व्याख्या की गई थी। अदालतों ने स्पष्ट किया कि लेटर्स पेटेंट के क्लॉज 12 के तहत 'फैसला' (Judgment) वही आदेश माना जा सकता है जो पक्षकारों के बीच किसी अधिकार या मुद्दे का अंतिम निर्धारण करता हो। कार्यवाही के दौरान पारित अंतरिम या मध्यवर्ती आदेश (interlocutory or intermediary orders) लेटर्स पेटेंट अपील (LPA) के तहत अपील योग्य 'फैसला' नहीं कहलाते। 

उच्च न्यायालय का अंतिम आदेश और विशेष टिप्पणी: अंतरिम आदेश पर रिट अपील पोषणीय नहीं

न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की ओर से लिखे गए आदेश में उच्च न्यायालय ने एकल पीठ के विवादित आदेश (दिनांक 25.08.2026) का अवलोकन कर अपना अंतिम निष्कर्ष दिया। पीठ ने माना कि एकल पीठ द्वारा कोई अंतिम आदेश पारित नहीं किया गया है और न ही अवमाननाकर्ता को प्रथम दृष्टया (prima facie) दोषी ठहराने का कोई निष्कर्ष रिकॉर्ड किया गया है। एकल पीठ ने केवल लोक निर्माण विभाग के प्रमुख सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति का निर्देश दिया था, जो कि केवल प्रक्रियात्मक संचालन का एक अंतरिम आदेश है। उच्च न्यायालय ने कहा कि routine आदेश जो केस के लंबित रहने के दौरान पारित किए जाते हैं, वे धारा 19 के तहत नहीं आते क्योंकि वे सजा या मुख्य अवमानना का निर्धारण नहीं करते। अतः सर्वोच्च न्यायालय के 'मिदनापुर पीपुल्स कोऑपरेटिव बैंक' के फैसले के सिद्धांतों का पालन करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की रिट अपील को गैर-पोषणीय (not maintainable) पाते हुए खारिज कर दिया। 

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