भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से आरंभ होने वाले गणेश पूजन और अनंत चतुर्दशी के दिन विसर्जन की परंपरा सनातन धर्मशास्त्रों, पुराणों तथा धर्म-स्मृति ग्रंथों के विधान पर आधारित है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी ने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से भगवान श्री गणेश को महाभारत की कथा सुनाना प्रारंभ किया था। लगातार 10 दिनों तक लिखने के कारण श्री गणेश जी के शरीर का तापमान अत्यधिक बढ़ गया था, जिसे शीतल करने के लिए अनंत चतुर्दशी के दिन कथा पूर्ण होने पर वेदव्यास जी ने उन्हें पवित्र सरोवर के जल में स्नान कराया था। इसी पावन प्रसंग को 10 दिवसीय गणेशोत्सव और अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन का प्रतीक माना जाता है।
शास्त्रोक्त प्रमाण एवं पार्थिव प्रतिमा विसर्जन का नियम
'गणेश पुराण' (उपासना खण्ड, अध्याय 87) में निर्देश दिया गया है कि यदि प्रतिमा किसी धातु (सोना, चाँदी, ताँबा आदि) की बनी हो तो पूजन के पश्चात् उसे किसी "सुपात्र" ब्राह्मण को अर्पित करना चाहिए, और यदि प्रतिमा माटी (पार्थिव) से निर्मित हो तो उसे परम उत्साह एवं श्रद्धा के साथ जल में विसर्जित करना चाहिए:
"ब्राह्मणाय प्रदातव्या मूर्तिश्चेद्धातुनिर्मिता।
अन्यथा परमोत्साहैर्जलमध्ये विसर्जयेत्॥"
इसके अतिरिक्त 'निर्णयसिंधु' (कमलाकर भट्ट द्वारा रचित) तथा 'चतुर्वर्ग चिंतामणि' (हेमाद्रि द्वारा रचित) जैसे प्रामाणिक ग्रंथों में बताया गया है कि मिट्टी से निर्मित मूर्तियों में प्राण-प्रतिष्ठा द्वारा देव-तत्व का आवाहन किया जाता है और पूजन संपन्न होने पर वैदिक मंत्रों द्वारा उत्तर-पूजन कर विसर्जन किया जाता है।
श्री गणेश पार्थिव प्रतिमा विसर्जन की क्रमबद्ध विधि
उत्तर-पूजा (अंतिम पूजन): विसर्जन से पूर्व भगवान श्री गणेश जी का अत्यंत भक्ति भाव से पंचोपचार अथवा षोडशोपचार पूजन करें। गणेश जी को दूर्वा, मोदक, फल, पुष्प, अक्षत तथा नए वस्त्र अर्पित करें और फिर पूरे परिवार के साथ श्रद्धापूर्वक उनकी आरती उतारें।
1. पंचोपचार पूजन (5 मुख्य चरण)
- पंचोपचार पूजन प्रकृति के पाँच तत्त्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) का प्रतीक माना जाता है:
- गंध (पृथ्वी तत्त्व): भगवान को रोली, चंदन, कुमकुम या अष्टगंध का तिलक लगाना।
- पुष्प (आकाश तत्त्व): ताजे फूल, माला, दूर्वा, तुलसी दल या पत्र अर्पित करना।
- धूप (वायु तत्त्व): सुगंधित धूप या अगरबत्ती जलाकर भगवान को दिखाना।
- दीप (अग्नि तत्त्व): गाय के घी या तेल का दीपक जलाकर आरती/दर्शन कराना।
- नैवेद्य (जल तत्त्व): फल, मिठाई, मोदक या घर में बना शुद्ध भोग अर्पित करना और आचमन (जल) कराना।
2. षोडशोपचार पूजन (16 विस्तृत चरण)
- षोडशोपचार पूजन में किसी पूज्य अतिथि के स्वागत-सत्कार की तरह भगवान की आराधना की जाती है:
- आवाहन: हाथ में पुष्प और अक्षत लेकर मंत्रों द्वारा देवता को आमंत्रित करना।
- आसन: भगवान के विराजमान होने के लिए वस्त्र या आसन अर्पित करना।
- पाद्य: भगवान के चरण धोने के लिए जल अर्पित करना।
- अर्घ्य: हाथ धुलवाने के लिए जल (या चंदन-पुष्प युक्त जल) अर्पित करना।
- आचमन: आचमन (मुख शुद्धि/जल पीने) के लिए जल अर्पित करना।
- स्नान: शुद्ध जल से स्नान कराना (पंचामृत स्नान भी इसी चरण में कराया जाता है, फिर शुद्ध जल चढ़ाया जाता है)।
- वस्त्र: नए वस्त्र या कलावा (यज्ञोपवीत/जनेऊ) अर्पित करना।
- आभूषण: मुकुट, हार या अन्य अलंकार अर्पित करना (न हो तो अक्षत अर्पित करें)।
- गंध (चंदन): श्रीखंड चंदन, कुमकुम या रोली का तिलक लगाना।
- पुष्प: ताजे फूल, पत्र (तुलसी/दूर्वा/बेलपत्र आदि) और माला पहनाना।
- धूप: सुगंधित धूप या दशांग धूप दिखाना।
- दीप: दीपक जलाकर भगवान के सम्मुख प्रज्वलित रखना।
- नैवेद्य: फल, मिठाई, पंचमेवा या भोग अर्पित करना और उसके बाद जल आचमन कराना।
- तांबूल (पान): भोग के बाद पान का पत्ता (लौंग, इलायची, सुपारी युक्त) अर्पित करना।
- दक्षिणा: पूजन की पूर्णता के लिए श्रद्धानुसार द्रव्य (सिक्का या धन) और श्रीफल अर्पित करना।
- आरती व परिक्रमा: कपूर/दीपक से आरती करना, परिक्रमा करना और क्षमा-प्रार्थना करना।
क्षमा-याचना एवं पुनरागमनाय प्रार्थना
पूजन के उपरांत जाने-अनजाने में हुई किसी भी त्रुटि या भूल-चूक के लिए भगवान श्री गणेश से हाथ जोड़कर क्षमा-याचना करें। इसके पश्चात्, आगामी वर्ष में पुनः अपने धाम पधारने हेतु उनसे "पुनरगमनाय च" की भावपूर्ण प्रार्थना करें।
विसर्जन मंत्र एवं आवाहन
भगवान गणेश को अपने परम धाम (कैलाश/स्वलोक) लौटने का निवेदन करते हुए निम्नलिखित शास्त्रोक्त विसर्जन मंत्र का उच्चारण करें:
"गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
मम पूजां गृहीत्वेमां पुनरागमनाय च॥"
(अर्थ: हे देवश्रेष्ठ परमेश्वर! मेरी इस पूजा को स्वीकार कर अपने परम धाम को गमन करें और पुनः आने की कृपा करें।)
प्रतिमा का संचलन (स्थान परिवर्तन)
मंत्रोच्चार के पश्चात् श्री गणेश की पार्थिव प्रतिमा को उनके स्थापित स्थान से थोड़ा-सा आगे खिसकाएं (हिलाएं)। यह प्रक्रिया इस बात का प्रतीक है कि प्रतिमा का उत्तर-पूजन पूर्ण हो चुका है और देव-तत्व का विसर्जन प्रारंभ हो गया है।
जल-विसर्जन
इसके पश्चात् प्रतिमा को अत्यंत आदर, श्रद्धा और जयघोष के साथ किसी पवित्र नदी, सरोवर, समुद्र अथवा घर में ही शुद्ध जल से भरे पात्र में विसर्जित करें। विसर्जन के समय मन में केवल भक्ति, कृतज्ञता और बप्पा के प्रति अटूट प्रेम का भाव रखें।
विसर्जन से संबंधित शास्त्रोक्त नियम
केवल पार्थिव प्रतिमा का जल-विसर्जन: शास्त्रों के अनुसार केवल माटी या प्राकृतिक रूप से घुलनशील पदार्थों से निर्मित मूर्तियों का ही जल-विसर्जन करना श्रेयस्कर है, ताकि प्रकृति और जल-स्रोतों की पवित्रता बनी रहे।
स्थायी मूर्तियों के विसर्जन का निषेध: घर के पूजा-स्थल या मंदिर में स्थापित धातु, पत्थर अथवा स्फटिक की स्थायी मूर्तियों का विसर्जन नहीं किया जाता। केवल भाद्रपद या विशेष अवसरों पर स्थापित पार्थिव प्रतिमाओं का ही विसर्जन शास्त्रसम्मत है।
श्री गणेश की पार्थिव प्रतिमा का विसर्जन: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. अनंत चतुर्दशी को ही श्री गणेश की प्रतिमा का विसर्जन क्यों किया जाता है?
उत्तर: पौराणिक प्रसंग के अनुसार, महर्षि वेदव्यास जी द्वारा 10 दिनों तक महाभारत कथा सुनाने से श्री गणेश का शरीर तप्त हो गया था। अनंत चतुर्दशी के दिन कथा पूर्ण होने पर वेदव्यास जी ने उन्हें शीतल करने के लिए सरोवर के जल में स्नान कराया था, तभी से अनंत चतुर्दशी पर विसर्जन का विधान है।
Q2. विसर्जन के समय कौन सा मंत्र बोलना चाहिए?
उत्तर: विसर्जन के समय निम्नलिखित मंत्र बोलना चाहिए:
"गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर। मम पूजां गृहीत्वेमां पुनरागमनाय च॥"
Q3. क्या धातु या पत्थर की गणेश मूर्ति का भी विसर्जन किया जा सकता है?
उत्तर: नहीं, शास्त्रों के अनुसार धातु, पत्थर या स्फटिक की स्थायी मूर्तियों का विसर्जन निषेध है। यदि धातु की मूर्ति हो तो उसे पूजा के बाद ब्राह्मण को दान करने का विधान है; जल में केवल मिट्टी की पार्थिव प्रतिमा का ही विसर्जन किया जाता है।
Q4. यदि नदी या सरोवर में जाना संभव न हो, तो विसर्जन कैसे करें?
उत्तर: शास्त्रों के अनुसार, यदि बाहर जल-स्रोतों में विसर्जन संभव न हो, तो घर में ही शुद्ध जल से भरे स्वच्छ पात्र में आदर एवं जयघोष के साथ पार्थिव प्रतिमा का जल-विसर्जन किया जा सकता है।
प्रस्तुति: श्यामला ज्योतिष पीठ, भोपाल।

