विंध्य की धरती पर भगवान श्रीगणेश की एक अद्भुत और अलौकिक प्रतिमा स्थित है, जो किसी मंदिर में नहीं, बल्कि सीधे चट्टान को उकेर कर बनाई गई है। जिला मुख्यालय रीवा से लगभग 47 किलोमीटर दूर सिरमौर क्षेत्र के घने जंगलों में, टोंस हाइडल पॉवर प्लांट मार्ग से लगभग 3 किमी अंदर, आल्हा की तपोभूमि पर यह चमत्कारिक प्रतिमा विद्यमान है।
महायोद्धा आल्हा के साथ गजानन
पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रतिमा 12वीं शताब्दी की मानी जाती है। इसमें भगवान गजानन आशीर्वाद मुद्रा में भक्तों को दर्शन देते हैं। प्रतिमा के ठीक नीचे एक मुकुट की आकृति भी उकेरी गई है, और इसी चट्टान पर लोकदेव महायोद्धा आल्हा का चित्र भी बना हुआ है। इस ऐतिहासिक धरोहर को पहली बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने वर्ष 1883-84 में प्रकाश में लाया था।
संरक्षित स्मारक का दर्जा:
इस ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए भारत सरकार ने इस स्थल को संरक्षित स्मारक के रूप में घोषित किया है। वहीं मध्यप्रदेश सरकार ने इसे मनोरंजक स्थल (EcoTourism Place) के रूप में विकसित किया है, जिससे अब यहां पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आवाजाही बढ़ गई है।
टूरिज्म एक्टिविस्ट सर्वेश सोनी का योगदान:
इस गुमनाम धरोहर को पहचान दिलाने में रीवा के टूरिज्म एक्टिविस्ट सर्वेश सोनी की भी भूमिका रही है। उन्होंने इस स्थल का गहन अध्ययन कर भारत सरकार और मध्यप्रदेश सरकार से लगातार पत्राचार किया, जिसके परिणामस्वरूप आज इस स्थान का कायाकल्प हो सका है।
गणेशोत्सव के दौरान यहां विशेष पूजा का आयोजन होता है और दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से यहां आने वाले हर भक्त को विघ्नहर्ता का आशीर्वाद अवश्य प्राप्त होता है।

